भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों की हिफाजत के लिए एक संयुक्त समिति बनाने का प्रस्ताव रखा है। इसके लिए उन्होंने प्रमुख न्यूज चैनलों के संपादकों से सहयोग की अपील की है। इस समिति का काम मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी होगा। ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष शाजी जमां और महासचिव एनके सिंह को लिखे एक पत्र के जरिए काटजू ने कहा कि समिति में पीसीआइ और बीईए के सदस्यों की संख्या बराबर होगी। काटजू ने पत्र में लिखा मेरा सुझाव है कि प्रेस परिषद और बीईए के बीच एक समन्वय समिति बनाई जाए जिसमें दोनों संस्थाओं के तीन या इससे अधिक प्रतिनिधि हों। काटजू ने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों में मीडिया की स्वतंत्रता खतरे में है जिसकी सुरक्षा के लिए संयुक्त समिति की जरूरत महसूस की गई है। उन्होंने पत्र में लिखा देश के कई हिस्सों में मीडिया की आजादी को खतरा पैदा हो गया है और इस खतरनाक प्रवृत्ति के खिलाफ हमें मिलकर लड़ना चाहिए वरना हालात बद से बदतर हो सकते हैं। काटजू के पत्र में कहा गया है कि देश के कई हिस्सों में मीडियाकर्मियों पर हमले हुए हैं, जबकि अन्य जगहों पर सरकारों ने प्रोपराइटरों पर उन पत्रकारों को नौकरी से निकालने या तबादला करने का दबाव बनाया है जिन्होंने सरकार के खिलाफ लिखा। उन्होंने कहा मैं मीडिया की आजादी को उन जगहों पर बरकरार रखने के लिए लड़ता रहा हूं जहां इसे खतरा है। जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि राज्य इसके उदाहरण हैं। अपने पत्र में काटजू ने स्पष्ट किया कि यूं तो प्रेस परिषद सिर्फ प्रिंट मीडिया के मामलों को देखता है, लेकिन मैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आजादी के लिए भी लड़ता रहा हूं। प्रेस परिषद के अध्यक्ष ने ब्रोडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन से अनुरोध किया है कि वे इस प्रस्ताव पर जल्द से जल्द अपनी राय दें ताकि इसे परिषद की अगली बैठक में विचारार्थ रखा जाए। उन्होंने कहा कि अगर आप शीघ्रता से अपनी राय देंगे तो 26 से 28 मार्च को लखनऊ में होने वाले बैठक में इसे रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि मैं इस बाबत आश्वस्त हूं कि इस प्रस्ताव को अनुमोदित कर दिया जाएगा। मीडिया को लेकर अक्सर बयान देने वाले भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कडेय काटजू देश के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों पर हो रहे हमले और सत्ता के विरोध में लिखने पर डाले जा रहे दबाव को लेकर भी काफी मुखर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि हाल के दिनों में विभिन्न राज्यों में पत्रकारों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डाला जा रहा है।
Tuesday, March 20, 2012
Tuesday, February 7, 2012
मीडिया की आजादी पर नई बहस
कितना स्वतंत्र है मीडिया या फिर कितना स्वतंत्र है अभिव्यक्ति का अधिकार? हाल के तीन भाषणों से यह सवाल उभरता है। इनमें पहला भाषण है उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का, दूसरा है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का और तीसरा प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कडेय काटजू का। धमकी के कारण सलमान रुश्दी जयपुर साहित्य महोत्सव में शामिल नहीं हो सके। इस कारण अभिव्यक्ति के अधिकार का सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। इसी तरह भाजपा की छात्र शाखा के विरोध के कारण पुणे में कश्मीर पर बनी डाक्युमेंट्री की स्क्रीनिंग नहीं हो सकी। उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दोनों ने ही अपने भाषणों में मीडिया को अपनी भूमिका के बारे में आत्मनिरीक्षण करने की सलाह दी है। उनके भाषणों में मीडिया पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, किसी तरीके से नियंत्रण लगाने का कोई संकेत तक नहीं था। हालांकि न्यायमूर्ति काटजू ने चेतावनी दी कि कुछ नियंत्रण भी लगाए जा सकते हैं, क्योंकि आत्मनियंत्रण सही मामले में नियंत्रण नहीं हैं। आपातकाल के दौरान लगाई गई सेंसरशिप को छोड़कर आजादी के बाद से इस मामले में सरकार का साफ-सुथरा रिकार्ड रहा है। केंद्र की सरकारें पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का अनुसरण करती आई हैं। नेहरू ने 3 दिसंबर, 1950 को अखिल भारतीय समाचार पत्र संपादक सम्मेलन को आश्वस्त किया था कि मैं प्रेस को पूरी स्वतंत्रता दूंगा, लेकिन जस्टिस काटजू दूसरी राह पर नजर आ रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि प्रेस काउंसिल का गठन प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हुआ था। दुर्भाग्यवश उनके भाषणों में मीडिया की कार्यशैली या संस्कृति की झलक नहीं दिख रही। प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष बनने के एक ही दिन बाद उन्होंने पत्रकारों को निरक्षर घोषित कर दिया। अगर किसी व्यक्ति में सही तरीके से लिखने, समाचार को समझने या विश्लेषण की काबलियत न हो तो कोई व्यक्ति अपनी डिग्री के बल पर पत्रकार नहीं बन सकता। हमें जानना चाहिए कि भारत में जो शीर्ष पत्रकार हुए हैं उनमें प्रमुख एस मुलगांवकर ग्रेजुएट भी नहीं थे। मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि मीडिया व्यवस्था का अंग बनता जा रहा है। स्वतंत्र समाज में प्रेस का काम निर्भय होकर निष्पक्ष तरीके से लोगों को घटनाओं की जानकारी देना है। कभी-कभी यह काम अप्रिय भी हो सकता है, लेकिन इसे करना पड़ता है, क्योंकि स्वतंत्र सूचना के आधार ही स्वतंत्र समाज बनता है। अगर प्रेस का काम सिर्फ सरकारी विज्ञप्तियां या आधिकारिक बयान प्रकाशित करना रहे तो फिर खामी या गलती निकालने की कोई जरूरत नहीं रहेगी। दुर्भाग्य से ऊंचे पदों पर बैठे लोग इस धारणा के साथ काम करते हैं कि इस बात सिर्फ वे ही जानते हैं कि देश को क्या और कब बताया जाना चाहिए? जब कभी उनके मनमाफिक खबर नहीं छपती तो वे उत्तेजित हो जाते हैं। सबसे पहले तो वे इसका प्रतिवाद करने की कोशिश करते हैं। इससे काम न चलने पर आधा-अधूरा स्पष्टीकरण दे दिया जाता है। मैं प्रेस काउंसिल में रहा हूं। उस समय हर सदस्य चाहता था कि प्रेस काउंसिल को बिना दांत का होना चाहिए। इसका गठन जांच करने वालों की जांच करने वाले संगठन के तौर पर किया गया था। जस्टिस काटजू का यह तर्क कि इसे दंड देने का अधिकार भी होना चाहिए, इसके गठन के मकसद को खत्म कर देता है। प्रेस काउंसिल कोई अदालत नहीं है। उसका गठन इस मकसद से किया गया था कि गलती करने वाले प्रकाशन अपनी गलती को कैसे सुधार सकते हैं, इसका फैसला करने का अधिकार काउंसिल के सदस्यों यानी संपादकों, पत्रकारों और मालिकों को ही दे देना चाहिए। फिसलन तब शुरू हुई जब काउंसिल ने जिन प्रकाशनों की निंदा की उन्होंने अपने खिलाफ काउंसिल के फैसले को छापना भी बंद कर दिया। मेरा मानना है कि काउंसिल के निर्णयों को प्रकाशित करना अनिवार्य बना देना चाहिए, भले ही निर्णय कितना भी अप्रिय क्यों न हो। जस्टिस काटजू को काउंसिल के रिकार्डो को देखना चाहिए। काउंसिल सूचना एवं प्रसारण मंत्रलय का ही अंग है। काउंसिल का सबसे बुरा हाल आपातकाल के दिनों में था। बाद में भी काउंसिल अपने स्वतंत्र अस्तित्व के मुताबिक काम नहीं कर सकी। जहां तक सलमान रुश्दी का मामला है, उन्हें अपनी यात्रा जान पर खतरे के भय से रद करनी पड़ी है। संभवत: सरकार उन्हें सुरक्षा प्रदान करने को लेकर अनिश्चय की स्थिति में थी, लेकिन सवाल यह नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है। सलमान रुश्दी की किताब द सैटनिक वर्सेज का विरोध करने वाले कुछ कट्टरपंथियों ने पूरे मुस्लिम समुदाय को बंधक बना लिया। उदारवादी मुसलमानों ने कुछ नहीं कहा, जबकि वे हिंदुओं के गलत कामों के खिलाफ खुलकर बोलते रहते हैं। मुस्लिम धर्मगुरुओं को अहसास होना चाहिए कि पंथनिरपेक्ष समाज में संविधान फतवा से ऊपर है। एमएफ हुसैन को हिंदू कट्टरपंथियों के कुछ ऐसे ही व्यवहार का सामना करना पड़ा था। इसी तरह कश्मीर पर बनी डाक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रद कर सिमबोसिस कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स ने भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति का उल्लंघन किया है। संजय काक की इस डाक्यूमेंट्री जश्ने-आजादी में सेना का विरोध किया गया है। इसके विरोध में मैं सिमबोसिस के प्रोफसर एमिरेट्स के पद से इस्तीफा दे रहा हूं। नि:संदेह पूरी दुनिया में स्वतंत्र अभिव्यक्ति की जगह सिकुड़ रही है। फिर भी मेरा मानना है कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति के दमन की इस मरुभूमि में भारत हरे-भरे स्थान की तरह है, लेकिन कट्टरपंथियों एवं लचर सरकारों ने मुझे गलत साबित कर दिया है। रुश्दी के मामले में उत्तर प्रदेश चुनाव के कारण स्थिति और बिगड़ी, क्योंकि राज्य में करीब 15 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Wednesday, December 28, 2011
मीडिया और सामाजिक परिवर्तन
सूचना एवं प्रौद्योगिकी के इस युग में पृथ्वी का दायरा सिमटता-सा नजर आ रहा है। आज वि के किसी भी कोने में घटित घटना हम घर में बैठे-बैठे ही देख रहे हैं। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर हमारे विचारों का विनिमय इस तरह हो रहा है जैसे हम परिवार के लोगों से करते हैं। वैीकरण की प्रक्रिया का सारा श्रेय जनसंचार माध्यम को जाता है जो सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं व रूढ़ियों की जटिलताओं को क्षीण करते हुए मिली-जुली संस्कृति एवं नए मानव मूल्यों की स्थापना कर रहा है। आज हम जिस सामाजिक परिवर्तन का दर्शन कर रहे हैं उसका सबसे अधिक श्रेय मीडिया को जाता है। लोगों की जीवनशैली में जिस तरह से परिवर्तन हुआ है उससे अमीरी और गरीबी की खाई पटती नजर आ रही है। व्यक्ति भले ही अभावों में जीवनयापन कर रहा हो लेकिन वह जीवन के अच्छे पहलू को समझ रहा है और उसको प्राप्त करने का प्रयास भी कर रहा है। दैनिक उपयोग की वस्तुओं का जिस तरह से सामान्यीकरण हुआ है उसमें महत्वपूर्ण योगदान जनसंचार माध्यमों का है। आज योग और आयुव्रेदिक उपचार से सारी दुनिया लाभान्वित हो रही है, अगर मीडिया इतनी प्रभावी न होती तो शायद सूचना इतनी तीव्र गति से नहीं पहुंचाई जा सकती थी। मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में समाज को मजबूत दिशा दे रहा है। लोकहित की रक्षा के लिए सरकार पर नियंतण्ररखते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती प्रदान करने का कार्य मीडिया के द्वारा हो रहा है। वर्तमान समाज में वैज्ञानिक चेतना का विकास हो रहा है जिससे कृषि उत्पाद दर और परिवार कल्याण को प्रोत्साहन मिल रहा है। खेल का मैदान भी मीडिया से अछूता नहीं है। इसके द्वारा खेलों की जानकारी के साथ-साथ राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय भावना का विकास हो रहा है। महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी एवं स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता मीडिया की ही देन है। भूमंडलीकरण के इस दौर में पिछले एक दशक से जिस उपभोक्तावादी संस्कृति ने जन्म लिया है उसका प्रभाव पूरे वि पर देखने को मिल रहा है। मीडिया भी इससे अछूता नहीं रह सका है। न्यूज चैनल उन्हीं तथ्यों को देखने और दिखाने के लिए तत्पर रहते हैं जो दर्शकों को ज्यादा लुभावने लग सकते हैं, भले ही उनके दिलो-दिमाग पर इसका कैसा भी असर पड़े। आरुषि हत्याकांड इसका एक उदाहरण भर है। जहां देश की अस्सी प्रतिशत जनता मीडिया द्वारा प्रस्तुत बात को आशीर्वचन समझती हो, ऐसे में उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना मीडिया का अपने कार्य और सिद्धांत से भटकना माना जाएगा। मीडिया समाज को दर्पण दिखाने का कार्य कर रहा है, लेकिन उस दर्पण में लोगों को अपना प्रतिरूप आदर्श लग रहा है। समाज का प्रतिबिंब देख, बदलने के स्थान पर लोग उसी में ढलते जा रहे हैं। यह मीडिया के लिए विचारणीय प्रश्न है। अगर एक दशक के सिनेमा पर विहंगम दृष्टि डालें तो बीस फीसद फिल्मों में स्कूल या कॉलेजों के चरित्र को दर्शाया गया है। लेकिन कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर फिल्मों में स्कूल या कॉलेजों के भोंडे स्वरूप को ही प्रस्तुत किया गया है। उसी की नकल स्कूल और कॉलेजों में शुरू हो गई है। इंटरनेट समाज के लिए वरदान है, लेकिन कुछ अश्लील वेबसाइट्स से युवा पीढ़ी गुमराह भी हो रही है। इस पर भी विचार की आवश्यकता है। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की दौड़ में खबर को मसालेदार और चटपटा बनाने के लिए सचाई को तोड़- मरोड़कर प्रस्तुत करना, अश्लीलता को परोसना, एक ही खबर को पूरे दिन या कई दिनों तक प्रस्तुत करना न्यूज चैनलों के लिए आम बात है। टीवी धारावाहिकों को इतना लंबा बनाया जा रहा है कि वे अंतहीन मालूम पड़ने लगते हैं। कुछ धारावाहिकों को छोड़ दिया जाए तो बाकी पाश्चात्य चमकद मक से ओत-प्रोत हैं जिससे हमारी संस्कृति, सभ्यता और इतिहास की जड़ें खोखली होती जा रही हैं जिसके कारण हम अपने आदर्श, मर्यादा, राष्ट्रप्रेम, समाज और संस्कृति से कटते जा रहे हैं। विज्ञापनों की अधिकता भी मीडिया के सकारात्मक पहलू को प्रभावित कर रही है। सच है कि विज्ञापनों के माध्यम से ही मीडिया को अर्थ की प्राप्ति होती है पर इतना ही मीडिया का उद्देश्य तो नहीं हो सकता। तीस मिनट के कार्यक्रम में सत्रह से अट्ठारह मिनट विज्ञापन में ही जाते हैं और उसी तीस मिनट के कार्यक्रम में एक ही विज्ञापन को चार से पांच बार दिखाया जाता है। इससे समय तो बर्बाद होता ही है बाजारवाद को भी बढ़ावा मिलता है। समय के साथ-साथ विज्ञापन की गुणवत्ता को भी ध्यान में रखना मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। समाचारपत्र भी इस प्रभाव से नहीं बच पाए हैं। जिस नीमहकीम को डॉक्टरों ने खारिज कर रखा है उसका भी विज्ञापन उच्च गुणवत्ता के मानक के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है। लोकतंत्र में कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका के समुचित ढंग से कार्य न करने के कारण लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया को अपनी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। आज का सबसे बड़ा सरोकार है नकारात्मकता भूमिका से सकारात्मक भूमिका में परिवर्तन। मीडिया की भूमिका जितनी सशक्त होगी, उतना ही अधिक सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन होगा।
Monday, December 19, 2011
सोशल मीडिया पर हिट, तो काम में फिट
फेसबुक, ट्विटर, ऑरकुट पर अगर अब तक अकाउंट नहीं खोला है, तो जल्द खोल लें। संभव है कि किसी कंपनी से नौकरी का शानदार ऑफर यहीं से आपको आ जाए। वजह यह है कि देश में तमाम कंपनियां अब नियुक्ति के लिए सोशल मीडिया को खंगाल रही हैं। कस्टमर रिलेशन (ग्राहकों के साथ संबंध) सुधारने के लिए भी वे इन पर सक्रिय हैं। सलाहकार फर्म केपीएमजी के सर्वे के मुताबिक देश में कंपनियों ने नियुक्ति के लिए नया पैमाना बनाया है। इसमें सोशल मीडिया पर नेटवर्किंग आपकी खूबी मानी जाती है। यानी सोशल मीडिया पर हिट हैं, तो काम के लिए भी फिट हैं। खास बात यह है कि भारत, चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं विकसित देशों के मुकाबले नियुक्ति के लिए सोशल मीडिया को अधिक वरीयता दे रही हैं। यह चलन तेजी से बढ़ा है। यह सर्वे दुनिया भर में करीब 4 हजार नियोक्ताओं और प्रबंधकों के बीच किया गया। सर्वे के मुताबिक, भारत में करीब 70 प्रतिशत कंपनियां सोशल मीडिया का इस्तेमाल करती हैं। चीन में यह संख्या और भी अधिक (88 प्रतिशत) है। ब्राजील में भी 68 प्रतिशत कंपनियां अपने ग्राहकों तक पहुंचने और कर्मचारियों को भर्ती करने के लिए इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करती हैं। इसके उलट विकसित देशों में इनके लिए सोशल मीडिया का उपयोग काफी कम है। जापान में 27, ऑस्ट्रेलिया में 41.6, स्वीडन में 41.7, जर्मनी में 43, ब्रिटेन में 48.2 और कनाडा में 51 प्रतिशत कंपनियां कर्मचारियों को रखने के लिए इस प्लेटफॉर्म को खंगालती हैं। सर्वे में यह भी कहा गया है कि सोशल मीडिया पर किसी तरह की रोक लगाने की कोशिश बेकार है। अंत में इसका खामियाजा कंपनी को ही भुगतना पड़ता है। किसी न किसी तरह से कर्मचारी सोशल मीडिया को इस्तेमाल कर ही लेते हैं। इसके लिए वे अपने ऑफिस उपकरणों में तमाम तरह के बदलावों से भी परहेज नहीं करते।
Friday, December 16, 2011
मायावी दुनिया रचता न्यू मीडिया
न्यू मीडिया, एक लहर के समान दुनिया भर में किसी न किसी कारण लगातार चर्चा में रह रहा है। अपने यहां अभी यह केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा सोशल नेटवर्किंग साइटों को अपनी विषयवस्तु पर छन्नी लगाकर उनकी दृष्टि में जो थोथा है उसे न आने देने और आ गया तो हटा देने की इच्छा जताने के कारण चर्चा में है। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कडेय काटजू ने इसका समर्थन किया है। काटजू ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर प्रिंट मीडिया के समान इलेक्ट्रॉनिक एवं समाचार से जुड़ी वेबसाइट्स को भी प्रेस परिषद के दायरे में लाने का अनुरोध किया है। गरमागरम बहस जारी है। जो अपने मातहत काम करने वालों को नियंतण्रमें रखने की सारी जुगत करते रहते हैं वे भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के शब्दवीर बने हैं। इसके पूर्व भारत सहित दुनिया भर में पिछले दोढार्इ सालों में जो आंदोलन हुए, उसमें भूमिका को लेकर तो न्यू मीडिया लगातार चर्चा में है ही। अगर न्यू मीडिया नहीं होता तो ये आंदोलन नहीं होते, ऐसा कहने वालों की कोई कमी नहीं है। दुनिया के समाजशास्त्रियों, भविष्यवेत्ताओं के एक वर्ग ने इसे डिजिटल डेमोक्रेसी नाम दिया है। इसके राजनीतिक प्रक्रिया संबंधी प्रभावों पर विस्तृत अध्ययन हो रहे हैं, शोध प्रबंध आ रहे हैं। इन अध्ययनों का सार यही है कि यह राजनीति या लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप में परिवर्तन नहीं ला सकता। डिजिटल तकनीकों तक पहुंच रखने वाले सक्षम लोग , वे चाहे राजनीति के अंदर के हों या बाहर के- इसका उपयोग करते रहेंगे, पर शक्ति संतुलन एवं राजनीतिक संरचना नहीं बदलेगी। न्यू मीडिया की आंदोलन में भूमिका की चर्चा ईरान और अरब की क्रांतियों के संदर्भ में काफी हुई है। 2009 को जब ईरान के चुनाव परिणाम आए, भारी संख्या में ईरानी सड़क पर उतरे और विरोध किया। पश्चिम ने इसका श्रेय फेसबुक, यू ट्यूब और ट्वीटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स को दिया। पश्चिमी मीडिया में इसे ट्वीटर रिवोल्यूशन ही कहा गया। अमेरिका के सुरक्षा सलाहकार ने कहा कि ट्वीटर को नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए क्योंकि उसके बिना ईरान के लोग लोकतंत्र तथा आजादी के लिए खड़े नहीं होते। लेकिन ईरान में ट्वीटर का अस्तित्व नहीं था। ईरान के एक लोकप्रिय ब्लॉगरअलीरेजा रेजेई, जिन्होंने स्वयं विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था- कहते हैं कि न्यू मीडिया ने न प्रदर्शनकारियों को मोबलाइज किया और न उनकी हौसला अफजाई की। ईरान में जो कुछ हुआ, वह जन आंदोलन था जो वास्तविक जनों द्वारा किया गया था। इनमें से अनेक न इंटरनेट और न्यू मीडिया का प्रयोग करते हैं और न उन तक उनकी पहुंच है। हां, मोबाइल फोन पर संदेशों ने इसमें योगदान दिया। वस्तुत: प्रदर्शन को कुचलने के प्रयासों ने इसे ज्यादा तीखा बना दिया। आंदोलन को ताकत से दबाने की कोशिश हुई तो लोगों ने सेल फोन से हिंसा की वीडियोग्राफी आरंभ कर दी। ये वीडियो यू ट्यूब पर अपलोड हुए और वहां से ट्वीटर एवं फेसबुक पर शेयर किए गए। लोगों ने उन वीडियोज को देखा, किंतु यह बाहर के देशों तक जानकारी पहुंचाने के ज्यादा काम आया। इरानियन ब्लॉगर एवं इंटरनेट एक्टिविस्ट वाहिद ऑन लाइन ने कहा कि ट्वीटर की भूमिका के बारे में अतिरंजना ज्यादा है। चूंकि बाहरी दुनिया उससे ईरान की घटनाओं को देख रही थी, इसलिए लगा कि विद्रोह में उसकी भूमिका है। अरब जगत में ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया में जो राजनीतिक परिवर्तन हुआ, उसमें न्यू मीडिया की भूमिका पर अध्ययन की जरूरत है। लेकिन न्यू मीडिया की भूमिका ईरान से बहुत ज्यादा इन देशों में हो ऐसा लगता नहीं। ट्वीट्स पूरी दुनिया में है, इसलिए मीडिया को इसका ध्यान आता है एवं यह मीडिया से जुड़े लोगोें के बीच पूरे वि में फैल जाता है। फेसबुक की भी यही स्थिति है। तहरीर चौक के जमावड़े के दौरान ट्वीटर, फेसबुक पर लोग सक्रिय थे लेकिन आंदोलन सड़कों पर हुआ। न्यू मीडिया का चरित्र ही सड़कों पर आंदोलन के विपरीत है। फेसबुक पर ज्यादा व्यस्त होने वाले यथार्थ से वचरुअल र्वल्ड में सिमट जाते हैं। आंदोलन ऑनलाइन, वचरुअल र्वल्ड या साइबर दुनिया में नहीं हो सकता। दुनिया के अनजाने लोग स्वच्छंद सोच को अभिव्यक्त कर यदि क्रांतियां करने लगें तो आंदोलनों के लिए इतने परिश्रम की आवश्यकता ही नहीं। आधुनिक पत्रकारिता और मीडिया की पैदाइश बाजार पूंजीवाद के विचार से विकसित औद्योगिक क्रांति से हुई है। न्यू मीडिया भी पूंजीवाद के प्रचंड रूप बाजार पूंजीवाद की पैदाइश है। पुरानी गाथाओं में दैत्यों-राक्षसों द्वारा अत्यधिक भक्षण की कथाओं को याद करिए तो पूंजीवाद के ज्यादातर यंत्र वैसे ही नजर आएंगे। इसमें ऐसा कोई यंत्र नहीं जो बिना ऊर्जा के चलता हो, जिसे बनाने में प्रकृति की अनमोल धरोहर खर्च न हुई हो, जिससे स्वास्थ्य एवं प्रकृति को कोई हानि न होती हो। एक बड़े विचार और व्यवहार में पूंजीवाद और उसकी अनुचर बनी औद्योगिक और तकनीकी क्रांति का बड़ा राक्षस और न्यू मीडिया के सारे यंत्र जो हमारे हाथों में हैं उसके ही वंशज हैं। न्यू मीडिया के रूप में हर सक्षम हाथ में छोटा राक्षस है जो मायावी संसार रचने की विनाशलीला मचा रहा है। एक बड़े वर्ग को इसके विनाश में आनंदातिरेक की अनुभूति हो रही है! न्यू मीडिया का संस्कार नियंतण्रऔर संतुलन के विपरीत है। हालांकि संस्कार से संयमी कई व्यक्ति किसी साइट पर अच्छी बातें लिख रहे हैं या कुछ अच्छा करने की प्रेरणा भी दे रहे हैं लेकिन ऐसे लोग अल्पसंख्यक हैं। न्यू मीडिया में सबसे ज्यादा स्पेस काम क्रीड़ा यानी पोर्न साइटों के पास है और सर्वाधिक विजिटर भी इनके ही हैं। न्यू मीडिया के माध्यम से समाज की सम्पूर्ण निजता का चीरहरण हो रहा है। सोशल नेटवर्किंग नाम से ऐसा लगता है जैसे समाज के बीच संर्पकों का जाल बुना जा रहा हो। जिस देश में व्यक्ति को सम्पूर्ण सृष्टि से जोड़ने की जीवन पण्राली स्थापित की गई थी वहां तथाकथित सोशल नेटवर्किंग दैत्य के रूप में उस पण्राली को ही नष्ट कर रहा है। पूरा न्यू मीडिया अपने-आपमें न सकारात्मक चरित्र का है और न सही दिशा में गमन के लिए प्रेरित करने वाला साधन, बल्कि अपनी उत्पत्ति और संस्कार दोनों में यह उसके विपरीत ले जाने वाला है। ब्लॉग, फेसबुक, ट्वीटर, मोबाइल संदेश, यू ट्यूब आदि को नियंत्रित या संतुलित करने की कोशिश सफल नहीं हो सकती। दैत्य की तरह इसका अंत करना होगा। किंतु मरने तक यह मानवीय सभ्यता के न जाने कितने पहलुओं को नष्ट कर अराजकताओं का जाल खड़ा कर चुका होगा।
Monday, November 21, 2011
हेगड़े ने भी मीडिया को नियामक तंत्र के दायरे में लाने की वकालत की
कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने भी मीडिया को नियामक तंत्र के दायरे में लाने की वकालत की है। उन्होंने मीडिया के कामकाज पर कुछ हद तक कानूनी नियंत्रण का पक्ष लिया है। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कडेय काटजू और उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी भी इसकी हिमायत कर चुके हैं। पेड न्यूज और मीडिया को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करने जैसी वजहें गिनाते हुए हुए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ने इसकी हिमायत की। उन्होंने कहा कि झूठी खबरों पर लगाम लगाने के उद्देश्य से भी मीडियाकर्मियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। हेगड़े ने कहा कि ऐसी कई घटनाएं हैं जिनमें मीडिया का कुछ छिपे हुए हितों के लिए इस्तेमाल किया गया। उन्होंने पूर्व लोकायुक्त एसपी मधुकर शेट्टी के बयान का जिक्र किया जिन्होंने कहा था कि कर्नाटक में भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। हेगड़े ने सवाल उठाया कि इस खबर को चार महीने बाद जारी करना क्या ईमानदार पत्रकारिता है? आप अचानक ही किसी कहानी को प्रकाशित कर देते हैं, जब वह कुछ लोगों के लिए काम की हो। अगर यही उद्देश्य है, तो क्या यह सही पत्रकारिता है।
Monday, October 31, 2011
इलेक्ट्रानिक मीडिया भी प्रेस परिषद के दायरे में हो : काटजू
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भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर उन्हें सुझाव दिया है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी परिषद के दायरे में लाया जाना चाहिए और निकाय को अधिक शक्तियां दी जानी चाहिए। जस्टिस काटजू ने एक टीवी कार्यक्रम में कहा, ‘मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी प्रेस परिषद के दायरे में लाया जाना चाहिए, इसे मीडिया परिषद नाम दिया जाना चाहिए व इसे अधिक शक्तियां दी जानी चाहिए। ऐसी शक्तियों का चरम परिस्थितियों में इस्तेमाल होगा।’ उन्होंने कहा कि उन्हें उनका लिखा पत्र प्राप्त हो जाने और ‘उस पर विचार किए जाने’ का प्रधानमंत्री की ओर से खत मिला है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने कहा कि उन्होंने लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज से भी मुलाकात की, जिन्होंने उन्हें बताया कि इस बारे में संभवत: ‘आम सहमति’ बन जाएगी। एक सवाल के जवाब में काटजू ने कहा, ‘मैं सरकारी विज्ञापन रोकने की शक्ति चाहता हूं। अगर कोई मीडिया काफी निंदनीय तरीके से काम करे तो मैं एक निश्चित अवधि के लिए उसके लाइसेंस को निलंबित करने और दंड लगाने का अधिकार चाहता हूं।’
उन्होंने कहा कि इन सभी उपायों का इस्तेमाल चरम परिस्थितियों में ही होगा। इस सवाल पर कि क्या इन उपायों से मीडिया की स्वतंत्रता खतरे में नहीं पड़ेगी, उन्होंने कहा, ‘लोकतंत्र में हर कोई जवाबदेह है। कोई भी स्वतंत्रता निरंकुश नहीं होती। हर आजादी के साथ जायज पाबंदियां भी होती हैं। मैं जवाबदेह हूं, आप भी जवाबदेह हैं। हम जनता के प्रति जवाबदेह हैं।’ उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि टीवी चैनलों पर होने वाली बहस उथली होती हैं और परिचर्चा के वक्ताओं के बीच कोई अनुशासन नहीं होता। उन्होंने कहा, ‘यह कोई चीखने-चिल्लाने की प्रतियोगिता नहीं है।’ उन्होंने तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ में लिखी एक पंक्ति ‘भय बिन होय न प्रीत’ का हवाला देते हुए कहा, ‘मीडिया में कुछ भय का भाव होना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि मीडिया के प्रति उनके विचार अच्छे नहीं हैं। मीडिया को जनहित में काम करना चाहिए। वे जनहित में काम नहीं कर रहे हैं। कभी-कभी वे जनविरोधी तरीके से काम करते हैं। ‘भारतीय मीडिया भी अक्सर जनविरोधी भूमिका निभाता है। वह अक्सर जनता का ध्यान उन वास्तविक समस्याओं से हटा देता है जो बुनियादी रूप से आर्थिक समस्याएं होती हैं।’ काटजू ने कहा, ‘80 फीसद लोग अत्यधिक गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और स्वास्थ्य सेवा संबंधी समस्याओं के साथ जी रहे हैं। आप (मीडिया) इन समस्याओं से उनका ध्यान बंटा देते हैं। आप फिल्मी सितारों और फैशन परेड को इस तरह पेश करते हैं, जैसे यही जनता की समस्या हो।..क्रि केट जनता के लिए नशे की तरह है। रोमन शासक कहा करते थे कि अगर आप जनता को रोटी नहीं दे सकते तो उन्हें सर्कस दीजिए। भारत में जनता को अगर आप रोटी नहीं दे सकते तो उसे क्रि केट दीजिए।’
काटजू ने कहा कि जहां कहीं भी बम विस्फोट होता है, कुछ ही घंटों के भीतर हर चैनल यह दिखाने लग जाता है कि उसे इंडियन मुजाहिदीन या जैश-ए-मोहम्मद या हरकत-उल-अंसार या अन्य किसी मुस्लिम नाम से ई-मेल या एसएमएस आया है, जिसमें जिम्मेदारी ली गई है। ‘आप देख सकते हैं कि कोई भी शरारती व्यक्ति ई-मेल या एसएमएस भेज सकता है लेकिन उसे टीवी चैनल पर दिखाकर आप कपटपूण तरीके से यह संदेश दे रहे हैं कि सभी मुस्लिम आतंकवादी हैं और बम फेंकने वाले हैं और आप मुस्लिमों को बुरा बता रहे हैं। सभी समुदायों में 99 फीसदी लोग अच्छे होते हैं।’
उन्होंने कहा कि भारत सामंती कृषि समाज से आधुनिक औद्योगिक समाज बनने के परिवर्तनशील दौर में है। यह इतिहास का सबसे दर्दनाक और दुखदायी दौर है। जब यूरोप इस दौर से गुजर रहा था तो वहां मीडिया ने बड़ी भूमिका अदा की थी। ‘यूरोप में रोउसेयू, वाल्टेयर, थॉमस पेन, जूनियस, डीडेरॉट जैसे महान लेखकों ने मदद की। ..यहां मीडिया अंधविास और ज्योतिष को बढ़ावा देता है। देश में 90 फीसद लोग मानसिक रूप से पिछड़े हुए और जातिवाद, साम्प्रदायिकता व अंधविास आदि में डूबे हुए हैं।’ काटजू ने कहा कि जनता को आधुनिक वैज्ञानिक विचारों की जरूरत है, लेकिन इसके उलट हो रहा है। उदाहरण बताते हुए उन्होंने कहा, ‘एक टीवी चैनल पर लगातार दो दिन हाईकोर्ट के एक जज की तस्वीर को एक बदमाश अपराधी की तस्वीर के साथ दिखाया जाता रहा।’
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