Monday, February 7, 2011

साइबर स्पेस और जन उभार


मीडिया का ऐसा ग्लोबल प्रभाव किसी अन्य घटना की कवरेज में देखने को नहीं मिला। प्रख्यात पत्रकार जान रीड की प्रसिद्ध रिपोर्ट दस दिन जब दुनिया हिल उठीकी तर्ज पर कहा जा सकता हैतेरह दिन जब अरब दुनिया हिल उठी!इतनी बड़ी जन घटना कहीं हुई भी नहीं जिसे मीडिया ने इस कदर कवर किया हो। जिन समाजों को धर्म तत्ववाद की गिरफ्त में बंदसमझा गया वहां अचानक जन उभार फूट निकला!
जो समाज अलकायदा के रहमोकरम पर छोड़ दिए गए थे वे जनतंत्र की मांग करने लगे! नए मीडिया का यह गजब का फलागम है
अरब दुनिया को अलकायदा या इसलामी तत्ववादी उतना नहीं बदल पाए जितना पिछले तेरह दिन में मीडिया और सूचना पण्रालियों ने बदल दिया है। बदलाव की यह जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक प्रक्रिया है जो अब तक की परिचित राजनीतिक परिघटनाओं से अलग है और जबर्दस्त है। यह बताती है कि समकालीन सूचना-युग में परंपरागत तानाशाहियां संभव नहीं। नई जनताएं; पब्लिक्स सामने हैं। उनके नए माध्यम सामने हैं और उनकी आवाजें दब नहीं रही हैं। वे अपना स्पेस मांग रही हैं और जब नहीं दिया जाता है तो लेने के लिए मैदान में सज जाती हैं। दसियों लाख लोग एक जगह जमे हैं। पड़ोसी, दुकानदार पानी-खाना, दवाई दे रहे हैं। लोग किस्तों में मूवमेंट कर रहे हैं। टुकड़ियों की तरह आगे-पीछे मोरचे लगाते हैं। घायलों को मोरचे से पीछे हटाया जाता है और उनकी जगह नए मोरचा संभालते हैं। एक अजीब हलचल भरा असहयोग आंदोलन है। अजीब-सी एकता है जिसमें तरह-तरह के तत्व सक्रिय हैं। कोई एकमेव नेता नहीं दिखता है लेकिन सब एक-दूसरे से संवाद में हैं। इस विद्रोह की सफलता-असफलता इसमें सक्रिय लोगों के जीवन की तल्खियों, अभावों, शासकों की नित्य छलनाओं, हताशाओं और विक्षोभों के बीच साइबर सूचनाओं और साइबर साइटों पर बनते साइबर नागरिकोंकी एकता की कुछ कर गुजरने की भावनाओं के अनंत तनावग्रस्त धागों से बंधी है। काहिरा के तहरीर चौक और लिबरेशन चौक के दृश्यों को देखते-देखते अपने आप से सवाल पूछते हैं- क्या आज की ट्विटर-साइबर पीढ़ी भी कोई सत्तात्मक बदलाव कर सकती है? इस सवाल का जवाब नए राजनीतिक जनक्षेत्र के अध्ययन में ही मिल सकता है। राजनीतिक सिद्धांतवेत्ताओं के लिए इसका अध्ययन चुनौतीपूर्ण है। एक बेहद विचल, हाइपर और तरल किस्म का उत्तर-आधुनिक जन उभार नजर आता है। जन-लहर पर जन-लहर है। चैनलों के रिपोर्टर ऊंची बिल्डिंगों की छतों से लाइव कवरेज दिखाते रहते हैं। नीचे रेले पर रेले हैं, नारे हैं। गुस्से भरे नारों, अलाहू अकबर के लयात्मक नारों के बीच अचानक नमाज का वक्त होता है तो वहीं नमाज अता कर ली जाती है और उसके बाद वहीं तहरीर चौराहे की सड़कों के पत्थर उखाड़ कर फेंके जाने लगते हैं। फौज की गोली चलने लगती है। लोग गोली खाकर गिरते हैं, पत्थरों से माथे फूटते है, चेहरे लहूलुहान नजर आते हैं। अचानक सीन में कोई गिर पड़ता है, उसे उठाया जाता है, सुरक्षित बाहर लाया जाता है। किसी को कोई दबोच लेता है और उसे पीटा जाने लगता है। युवा लड़के-लड़कियों के हुजूम हैं। बहुत से वयस्क आ जुटे हैं जो मुबारक को विदा करने पर आमादा हैं। मुस्लिम ब्रदरहुड के अलावा किसी संगठन का नाम इससे अब तक नहीं जुड़ा। किसी का कोई भाषण नहीं नजर आता। न कोई नेता है न कोई लाइन है, न कोई कार्यक्रम हैं। बस एक लाइन है- जाओ मुबारक जाओ!
मिस्र के इस उभार को देख अपने देश के एक न्यूज एंकर अर्णव गोस्वामी अपने संपन्न विक्षोभ में यहां तक कह डालते हैं कि इससे अपने देश के दल भी सबक लें। जनता से छल न करें। एक काहिरा यहां भी हो सकता है। मिस्र का कवरेज; देखने वाले के खाए-पिए निराश मन में ऐसी ही प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है! ऐसी टिप्पणियां इन दिनों आम सुनी जा सकती हैं। मीडिया का ऐसा ग्लोबल प्रभाव किसी अन्य घटना की कवरेज में देखने को नहीं मिला। प्रख्यात पत्रकार जान रीड की प्रसिद्ध रिपोर्ट दस दिन जब दुनिया हिल उठीकी तर्ज पर कहा जा सकता है तेरह दिन जब अरब दुनिया हिल उठी!इतनी बड़ी जन घटना कहीं हुई भी नहीं जिसे मीडिया ने इस कदर कवर किया हो। जिन समाजों को धर्म तत्ववाद की गिरफ्त में बंदसमझा गया वहां अचानक जन उभार फूट निकला! जो समाज अलकायदा के रहमोकरम पर छोड़ दिए गए थे वे जनतंत्र की मांग करने लगे! नए मीडिया का यह गजब का फलागम है! नया मीडिया न होता तो शायद यह इस तरह संभव न होता। नया मीडिया तत्ववाद की हवा किस तरह से निकाल रहा है इसे मिस्र की घटनाओं और मीडिया की अंतक्र्रियाओं में पढ़ा जा सकता है!
सूडान, यमन में मिस्र की अनुगूंजें सुनी जा रही हैं। वहां की सडकों पर मिस्र के जन उभार के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं। ईरान, अज्रेटीना, वेनेजुएला तक में मुबारक विरोधियें के पक्ष में प्रदर्शन जारी हैं। मिस्र देखते-देखते एक वि घटना बन उठा है। जिस उत्तर-आधुनिक मीडिया को अक्सर उपभोक्तावादी और प्रतिक्रियावादी माना जाता है वही इसका वाहक है। एक उभार नए तरह से उपभोगात्मक और अंतक्र्रियात्मक है कि हर जुबान पर इसका नाम है। मोबाइल न होते, एसएमएस, ट्विटर संदेश न होते, फेसबुक इत्यादि सामाजिक साइबर स्पेस न होते तो तानाशाहों के बूटों के नीचे दबी जनताएं अपनी आवाजें बुलंद नहीं कर सकती थीं। अमरीका-इस्रइल के कूटनीतिक दबावों में बैठे सुरक्षित स्वनिर्धारित, स्वनिर्वाचित अमर तानाशाहों को अपने अपने देशों की पब्लिक के क्रोध का पात्र बनना पड़ रहा है और पब्लिक का साहस इतना बढ़ा लगता है कि सत्ताओं के घुड़सवार, उनकी बटालियनें, उनके टैंक और बख्तरबंद गाड़ियां लोगों को डरा नहीं पा रहीं। जनविक्षोभों की एक श्रृंखला-सी बन रही है। ये जन बदलाव एक श्रंखला में लगातार प्रसारित होकर क्रमिक बन रहे हैं, बनाए जा रहे हैं। इनमें एक नए किस्म की साइबर स्वत: स्फूर्तता है। लंदन में बैठा एक विशेषज्ञ जब एक मिस्री एक्सपर्ट से बात करता है तो वह बताता है कि यह मुख्यतया मिस्री मध्य वर्ग का जन विद्रोह है। अरब देशों में एक बड़ा युवा वर्ग पैदा हो गया है जो अपनी जगह मांग रहा है। मिस्र में उन्तीस फीसद, सउदी अरब में तीस फीसद, सूडान में उन्तीस फीसद, लीबिया में तीस फीसद युवा आबादी की औसत उम्र तीस से कम है। यह नए अंगारे हैं, यही भभक उठे हैं। ट्विटर, फेसबुक पर अपनी टिप्पणियों से अपने आसपास के यथार्थ से नाना संवाद और हस्तक्षेप करते ये युवजन नई अपरिभाषित ग्लोबलकामनाएं हैं जो अचानक एक शून्य को भरने के लिए प्रज्वलित हो उठी हैं। आंदोलन के केंद्र तहरीर चौक पर सुबह के अखबार पटरी पर रखे हैं। आंदोलनकारी उनमें अपनी तस्वीरें देख रहे हैं। मुबारक के पहरेदार विदेशी पत्रकारों को पीट रहे हैं। हवाई अड्डे पर उनके कै मरे छीन रहे हैं। न्यूयार्क टाइम्स कह रहा है कि अगर आप भागने में तेज हों तभी कवर करने जाएं!
सूचनाएं समाजों को कई बार तेजी से बदलती हैं। मिस्र एक बड़ा उदाहरण है। बहुत से समाज धीरे-धीरे बदलते रहते हैं। मिस्र बता रहा है कि सूचना युग में परंपरागत जनतंत्र और साइबर जनतंत्र की अंतक्र्रिया बढ़ रही है जिसके फलागम अनिर्वचनीय हैं। एक बात तय है- जो नहीं बदलेगा वही बदल दिया जाएगा!


विचार की विदाई


मुंबई के एक अंग्रेजी दैनिक ने संपादकीय पृष्ठ को अलविदा कह दिया है। इसके संचालकों का कहना है कि यह पृष्ठ सबसे कम पढ़ा जाता है इसलिए इसे जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। इस अंग्रेजी दैनिक ने तय किया है कि वह प्रत्येक समाचार के साथ उसका विश्लेषण भी दिया करेगा। संचालकों को उम्मीद है कि इससे संपादकीय पृष्ठ के लोप हो जाने की पर्याप्त भरपाई हो सकेगी। यह प्रयोग नया नहीं है। इसके पहले दिल्ली से प्रकाशित एक प्रमुख दैनिक ने भी यही राह पकड़ी थी। उसके संचालकों को भी लगता था कि संपादकीय पृष्ठ पर पैसा खर्च करना फिजूलखर्ची है। क्यों न इस एक पन्ने का उपयोग मसालेदार चटपटी सामग्री छापने में किया जाए, लेकिन यह प्रयोग अधिक दिनों तक नहीं चल सका। संचालकों को संपादकीय पृष्ठ फिर शुरू करना पड़ा। इसी समूह का प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक कुछ वर्षो से संपादकीय पृष्ठ के साथ आंखमिचौली खेल रहा है। जहां तक मुझे याद पड़ता है, उसने भी कुछ दिनों के लिए संपादकीय पृष्ठ को गायब कर पाठकों की प्रतिक्रिया जानना चाहा था। यह प्रतिक्रिया अत्यंत प्रतिकूल रही होगी, तभी इस अंग्रेजी दैनिक को संपादकीय पृष्ठ वापस लाना पड़ा, लेकिन उसने इसे पहले वाला सम्मान नहीं दिया। संपादकीय पृष्ठ को कई तरह से अवहेलित करने की कोशिश की गई। उस पर प्रकाशित होने वाले लेखों का स्तर गिराया गया। संपादकीय पृष्ठ को पीछे धकेल दिया गया। फिलहाल वह कायम तो है पर पहले वाली गरिमा के साथ नहीं। कोई कह सकता है, जब संपादक ही नहीं रहा तब संपादकीय का क्या काम, लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है। संपादक के पद पर किसी प्रोफेशनल पत्रकार को रखने की परंपरा भले ही कमजोर या अदृश्य हो रही हो पर कोई न कोई व्यक्ति संपादक का काम करता जरूर है। जब तक अखबार है तब तक संपादक रहेगा। भले ही वह अखबार का स्वामी खुद हो या उसके द्वारा नियुक्त कोई अन्य व्यक्ति, जिसे भले ही संपादक की संज्ञा न दी जाए या इस रूप में उसका नाम प्रकाशित न किया जाए। जहां तक संपादकीय टिप्पणियों का सवाल है तो हो सकता है वे कल न रहें पर यह फैसला भी किसी संपादक का ही होगा। यदि दो अखबार संपादकीय टिप्पणियों को खत्म करने का प्रयोग कर चुके हैं और अब फिर एक अखबार ने ऐसा ही कदम उठाया है तो यह सोचने की गुंजाइश बनती है कि भविष्य के दैनिक सिर्फ समाचार और समाचार विश्लेषण छापें। जिस दिन ऐसा होगा वह विचार की विदाई का दिन होगा अर्थात अभी तक समाचारपत्र को जिस रूप में जानते आए हैं उसकी समाप्ति का दिन। मेरी नजर में वह अखबार की मृत्यु का दिन होगा। अखबार का विकास पश्चिम में हुआ। वहीं से विचारधारा के अंत का मुहावरा उछाला गया है। व्यवहार में हम यही पाते हैं कि एक खास तरह की विचारधारा को जैसे अमेरिकी व्यवस्था का दर्शन यानी पूंजी, उपभोग और मुक्त बाजार को दुनिया भर में फैलाने की कोशिश की जा रही है। इस विचार से कमोबेश सहमत होने के बावजूद पश्चिम में विचार खत्म नहीं हुआ है बल्कि उसकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है। आज भी दुनिया के सभी बड़े और प्रतिष्ठित दैनिकों में संपादकीय पृष्ठ की गरिमा को बचा कर रखा गया है। इन पत्रों में जो संपादकीय प्रकाशित होते हैं उन्हें बहुत गौर से पढ़ा जाता है और उद्धृत भी किया जाता है। हां, इंग्लैंड से प्रकाशित होने वाले टैबलॉयड दैनिकों में विचार के लिए कोई जगह नहीं होती। दरअसल ये दैनिक निकाले ही इसलिए जाते हैं ताकि पाठकों को नग्न या अर्धनग्न तसवीरें और सनसनीखेज समाचार परोसे जा सकें, लेकिन इन चटपटे पत्रों ने मुख्य धारा की पत्रकारिता को प्रभावित नहीं किया है। मयखाने अपनी जगह हैं और मंदिर पुस्तकालय तथा नाट्य गृह अपनी जगह। तो फिर भारत के अखबारों में पत्रकारिता के इस महत्वपूर्ण अंग से पीछा छुड़ाने का लालच क्यों दिखाई पड़ रहा है? इस सवाल के जवाब में भारत के नए मध्य वर्ग की कई प्रवृत्तियां देखी जा सकती हैं। इस वर्ग की जीवन शैली को शिश्नोदरवाद की संज्ञा दी जा सकती है यानी कमाओ, खाओ और मौज करो। जीवन में किन्हीं मूल्यों को स्थान देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे नैतिक दुविधाएं पैदा करते हैं। एक ऐसे देश में जहां आर्थिक विषमता का स्तर एवरेस्ट जितना ऊंचा है, विचार-विवेक और मूल्य निरंकुश उपभोग में मानसिक खलल पैदा करते हैं। इसलिए यथार्थ के इन रूपों से आंखें मूंद लेना ही ठीक है। यही विचार पत्रकारिता या मीडिया के एक वर्ग को संचालित कर रहा है। यह ठीक है कि संपादकीय पृष्ठ अखबार का सबसे कम पढ़ा जाने वाला पन्ना होता है। दूसरी तरफ इस पन्ने का स्तर बनाए रखने पर खर्च भी ज्यादा आता है। इसलिए इस पन्ने को ही सजा-ए-मौत दे देनी चाहिए यह तर्क किसी स्वस्थ चित्त से पैदा नहीं हो सकता। किसी भी शहर में नाटक देखने वालों की संख्या सिनेमा देखने वालों से कम होती है। पुस्तकालय से किताबें लाकर पढ़ने वालों की तादाद मॉल में घूमने वाले लोगों की संख्या बहुत कम होती है। किसी वैचारिक मुद्दे पर आयोजित सभा-संगोष्ठी में कम लोग जाते हैं, होटलों में लड़कियों का नाच देखने ज्यादा लोग जाते हैं। क्या इसलिए ये सारी अच्छी संस्थाएं और गतिविधियां बंद कर देनी चाहिए। यह सभ्यता और संस्कृति के विकास को ठोकर मारने जैसी कार्रवाई होगी।



Thursday, February 3, 2011

एक परंपरा पर पूर्ण विराम


लेखक हिंदी समाचारों का बुलेटिन बंद कर दिए जाने के बीबीसी के निर्णय पर निराशा जता रहे हैं
जब भारत में गणतंत्र दिवस के समारोह चल रहे थे उसी दिन ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन ने अपने हिंदी बुलेटिन से समाचार प्रसारण की अस्सी वर्षीय परंपरा को पूर्ण विराम लगा दिया। 27 जनवरी को चिली की संसद के अध्यक्ष जार्ज पिजारो सोतो भारत दौरे पर थे। भारत के उपराष्ट्रपति ने अपने आवास पर अंग्रेजी भाषा से उनकी अगवानी की। मेहमान के दुभाषिए ने फौरन टोकते हुए कहा कि हमारे महामहिम को अंग्रेजी समझने में दिक्कत है, क्योंकि चिली की भाषा स्पेनिश है। हम सभी अंग्रेजी को परदेशी भाषा मानते हुए भी उसके माध्यम से व्यवहार करने में प्रतिष्ठा की बात समझते हैं। संभवत: भारत ऐसे चंद देशों में शामिल है जहां आम लोगों के व्यवहार और शासकीय व्यवहार की भाषा अलग-अलग है। भारत की गुलामी काल से ही बीबीसी की हिंदी सेवा का प्रचलन था और विश्व के बहुत से देशों में भारत के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रवासी भारतीयों के अलावा भी लोग हिंदी बुलेटिन सुनने के अभ्यस्त थे। टीवी चैनलों ने पूरे विश्व के आकाश को छेद कर अपना आकार भले बड़ा कर लिया, लेकिन बीबीसी रेडियो से प्रसारित होने वाले समाचारों के श्रोताओं की संख्या में कोई कमी नहीं हुई। बीबीसी हिंदी समाचार का अलग ही क्रेज है। इस बुलेटिन को अर्थाभाव का बहाना बनाकर बीबीसी के प्रबंधकों ने बड़ी संख्या में भारतीय मानस केघाव को गहरा कर दिया है। भारत की आजादी के तुरंत बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का विश्व के नाम संदेश लेने के लिए बीबीसी का संवाददाता गया। गांधीजी हिंदी के लिए आग्रहशील थे और उनका साक्षात्कार हिंदी में ही हुआ। भारत स्थित इस श्रेष्ठ संस्था के प्रतिनिधि मार्क टुली ने न केवल हिंदी सीखी, बल्कि भारत उनके दिल में इतना रस बस गया कि वह सेवानिवृत्त होने के बाद भारत में ही निवास कर रहे। अंग्रेजी के कोख से जन्मी बीबीसी ने अपने बुलेटिन, अपने भाष्य, परिस्थितयों की व्याख्या के माध्यम से जितनी हिंदी की सेवा की उतनी बड़ी सेवा हिंदी में बनने वाली सभी फिल्मों ने भी नहीं की। 1974 में अपै्रल-मई में मुझे पश्चिमी यूरोप के एक देश बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स जाना पड़ा। वहां अंतरराष्ट्रीय समाजवादी युवा सम्मेलन आयोजित था। दूसरे दिन भारत के छात्र-युवा आंदोलन के बारे में लंबा इंटरव्यू लिया। उस इंटरव्यू को भारत में लोगों ने सुना। वह ऐसा दौर था जब आकाशवाणी को लोग आल इंदिरा रेडियो कहकर पुकारते थे। निष्पक्ष टिप्पणी के लिए बीबीसी का ही सहारा लिया जाता था। उस दौर में हिंदी बुलेटिन हिंदी भाषी जनता का सर्वाधिक पसंदीदा माध्यम था। केंद्र सरकार के विरुद्ध आंदोलनों की बाढ़ आ गई थी। बिहार, गुजरात के सघन छात्र आंदोलन, जबलपुर में जनता प्रत्याशी के रूप में शरद यादव की जीत, गुजरात की विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस की पराजय और रेल मजदूरों की ऐतिहासिक हड़ताल के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा प्रधानमंत्री के चुनाव को निरस्त किया जाना वास्तव में क्रांतिकारी स्फुरण का वर्ष था। उसकी याद आते ही एक नया उमंग और जोश पैदा हो जाता है। इन सभी घटनाक्रमों की सच्चाई जानने व समीक्षा के लिए आमजन बीबीसी का ही सहारा लेते थे। इसी दौर में इमरजेंसी लगी। प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई। लोग अपने मूल अधिकारों के लिए अदालत नहीं जा सकते थे। मेरी गिरफ्तारी बलिया में हुई। मेरे बिस्तर में एक छोटा ट्रांजिस्टर था, जिस पर केवल रात का बीबीसी प्रसारण सुना जाता था। जेल के सभी राजनीतिक बंदी बैरक में जमा होते और मैं पूरी बुलेटिन चुपके से सभी बंदी साथियों को सुना देता था। रत्नाकर भारती और ओंकार नाथ श्रीवास्तव की वाकशैली और तथ्यों की सफाई से जेल में निराश-उदास बैठे बंदियों में उत्साह का संचार हो जाता था। सुब्रहमण्यम स्वामी के राज्यसभा में हंगामा खड़ा करने के बाद पलायन की तस्वीर, जार्ज फर्नाडीज और उनके साथियों की हथकड़ी और बेड़ी के साथ कमर में रस्सा बांधकर तीस हजारी कोर्ट में पेशी का वर्णन रोंगटे खड़े करने वाला था। उसके हफ्ते भर बाद कुछ महीनों के बेटे को गोद में लिए जार्ज की पत्नी लैला कबीर ने किस तरह बीबीसी कार्यालय में प्रवेश किया, इसका सीधा प्रसारण किसी मुर्दे को भी संघर्ष के लिए खड़ा कर सकता था। इमरजेंसी के दौर में युवा मन को बीबीसी ने इतना रोमांचित किया कि अन्याय के खिलाफ जीवन भर जेल में रहने का जज्बा लोगों में पैदा हुआ। ऐसे दौर में जब लगता था कि लोकतंत्र का चिराग बुझ जाएगा तब बीबीसी ने अपनी प्रखर शैली से आम जन में साहस और विश्वास पैदा किया। आज बीबीसी के हिंदी बुलेटिन को बंद किए जाने की घोषणा निराशा पैदा करती है। बीबीसी हिंदी बुलेटिन आज भी प्रासांगिक है। देश का बौद्धिक वर्ग, हिंदी सेवी, हिंदी जगत का प्रतिनिधित्व करने वाले संसद सदस्य भारत सरकार को मजबूर करें और बीबीसी के प्रबंधतंत्र पर प्रभाव डालें कि हिंदी बुलेटिन बंद न हो। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)


Wednesday, February 2, 2011

अलविदा बीबीसी हिंदी सेवा


बीबीसी को बीबीसी के पुराणवाद ने मारा। नए जमाने ने मारा। उसके पुराने चेहरे ने नया मेकअप नहीं होने दिया। वह अभी तक एक आधिकारिक, सुव्यवस्थित, इंपीरियल, गोरे गर्व से निकलती, यूरोपीय हितों की ओर मुड़ी हुई सत्तामूलक खबरें देने वाला रहा। वह अपनी जड़ ता में दफन हुआ। अपने स्तर के गर्व में अकेला रहा। उसी तरह किनारे हुआ जिस तरह ऑल इंडिया रेडियो हो गया है। हां, इस चक्कर में हिंदी सेवा पहले पहल बलि चढ़ी
बीबीसी हिंदी सेवा अरसे से बीमार चल रही थी। उसका जाना तय था। कई साल से इसके लक्षण दिखने लगे थे। अनुभवी लोग बताने लगे थे कि अब वातावरण बदल गया है। हिंदी सेवा से प्रबंधन अपना पिंड छुड़ाना चाहता है, इत्यादि। हमारा मानना है बीबीसी को बीबीसी के पुराणवाद ने मारा नए। जमाने ने मारा। उसके पुराने चेहरे ने नया मेकअप नहीं होने दिया। वह अभी तक एक आधिकारिक, सुव्यवस्थित, इंपीरियल, गोरे गर्व से निकलती, यूरोपीय हितों की ओर मुड़ी हुई सत्तामूलक खबरें देने वाला रहा। वह अपनी जड़ता में दफन हुआ। अपने स्तर के गर्व में अकेला रहा। उसी तरह किनारे हुआ जिस तरह ऑल इंडिया रेडियो हो गया है। हां, इस चक्कर में हिंदी सेवा पहले पहल बलि चढ़ी। हिंदी की इस बलि पर रोने की जरूरत नहीं। बीबीसी की हिंदी सेवा खैराती हिंदी सेवा थी। कोई खैरात अहेतुकी नहीं होती। यह भी नहीं थी। उसके पीछे साम्राजी ब्रिटेन की ऐतिहासिक नीतियां रहीं। बीबीसी की सबसे प्रबल भूमिका शीतयुद्धीय दौर में रही जब उसके कंटेट में समाजवादी विचार को निशाना बनाया जाता था। फ्री र्वल्ड और व्यक्ति की आजादी मुख्य संदेश होते। क्यों होते? आखिर विंस्टन चर्चिल ही उस शीतयुद्ध के आविष्कर्ता थे जिनकी फु ल्टन स्पीच में दुनिया के दिमागों को जीतने की लड़ाई को दूसरे विश्वयुद्ध के उपरांत चलने वाली नई लड़ाई बताया गया था। 1945 पैंतालीस के बाद सारे जनसंचार, सूचना माध्यम, सारा साहित्य इस दिशा की ओर लाया गया था। उधर, सोवियत संघ फ्री र्वल्ड के मुकाबले समाजवाद के लाभ बताते हुए उसके विचार और पैम्पलेट लोगों तक फेंका करता था। सन् पैंतालीस से नब्बे तक का मीडिया इस शीतयुद्धीय वातावरण का उसी तरह निर्माता था जिस तरह राजनीति थी और साहित्य संस्कृति थे। वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा और अंग्रेजी समेत अन्य भारतीय भाषा सेवा इसी दिशा में काम करते थे। उस वक्त के बहुत-से सोवियत प्रकाशन प्रमाण सहित बताया करते थे कि किस अखबार में, किस रेडियो में, कहां-कहां सूचना पर साम्राजी कंट्रोल हो रहा है? कौन सी प्रेस एजेंसी, न्यूज एजेंसी किस-किस दुरभिसंधि में लगी रहती है? कितना झूठा प्रचार करती है? कहां, कौन न्यूज प्लांट करता रहता है? सीआईए की क्या भूमिका है? उसका कितना पैसा लगा है? कौन पत्रकार उसके पे-रोल्स पर हैं? किस फाउंडेशन का कितना पैसा कहां लगा है? उधर, ऐसे ही प्रत्यारोप सोवियत संजालों के बारे में लगाए जाते। कम्युनिस्ट विचार शत्रु की तरह देखे जाते, संपादित किए जाते। कम्युनिस्ट उधर अपने मीडिया में अपनी कट्टरताओं में मरे जाते। तब के रेडियो सीलोन की हिंदी सेवा इसी युद्ध का हिस्सा थी! मीडिया का नया इतिहास लिखने वाले अब इन बातों को कम लिखते हैं। सच यही है कि शीतयुद्ध के दौर में मीडिया में बहुत कुछ अजीबोगरीब होता रहा है! प्रमाण उपलब्ध हैं!
सोवियत संघ के गिरने के बाद और चीनी कम्युनिस्टों के पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था को भरपेट अपनाने के बाद जो विचार शैथिल्य; जिसे उदारवाद कहा जाता है, आया उसने मीडिया के भीतर-बाहर बहुत कुछ बदल डाला है। बीबीसी इस बदले जमाने में अपनी हिंदी सेवा की पुनर्परिभाषा करने में असमर्थ रहती थी क्योंकि अब किसी सुनिश्चित वैचारिक शत्रु से नित्य लड़ना नहीं है। और अब उपनिवेशक तक नहीं बचे थे। उत्तर शीतयुद्धकाल में अब मुक्त पूंजी ही सबकी मित्र है, हर तरफ है। ग्लोबलाइजेशन के नए नियम, नई शत्रे नित्य बन रही हैं। खैरातिया बजटों की जगह हर दान दाता जितना देता उससे ज्यादा उगाहने में लगता है। इस उगाहू दानलीला को टपकने के लिए एनजीओ विराजे हैं। जो इस परम आजादी में किसका एजेंडा किसके लिए, कहां कब चलाएं, नहीं जानते होते? हित और प्रक्रियाएं बेहद उलझीं और गुठ्ठल हैं। मीडिया ने अपना वैचारिक चोला उतार कर सेक्सी-स्टाक मारकेटी का चोला पहन लिया है। बताइए इस दौर में अपना बुलेटिन देने की जगह अगर बीबीसीमुन्नी बदनाम हुईसुनाने लगती तो उसके सुनने वालों को कैसा लगता? वॉयस आफ अमेरिकाशीला की जवानीसुनाने लगता तो कैसा लगता? हम जानते हैं कि आप अंग्रेज बनकरमुन्नी बदनामहुई गाते किसी को भाते। हार्ड न्यूज तुरत मुकदमे लाती है, कौन लड़े? कहते हैं कि मीडिया का मिजाज उसी की कैद होता है!
सवाल होगा कि बीबीसी ने हिंदी को ही क्यों त्यागा? अंग्रेजी को क्यों त्यागा? अरे भाई हिंदी अंग्रेज का आपदधर्म थी। कभी यह सेवा आपको सभ्य करने आई थी। सभ्य बनाती रही, आप सभ्य बन गए। और इतने बन गए कि अब अंग्रेज भी आपसे अंग्रेजी सीखते हैं। वे क्या करें? ग्लेबलाइजेशन का एक पर्याय जब अंग्रेजी बताया जा रहा हो तो अंग्रेजी क्यों छोड़ी जाए? अंग्रेज बहादुर सोचता है। हिंदी भी इस ग्लोबलाइजेशन में बदल गई है। वह एफएम की हिंदी की तरह हो चली है जिसे बीबीसी नहीं दे सकती। हिंदी अब अंग्रेज बहादुर की व्हाइट मेंन्स र्बडन उठाने वाली भाषा नहीं रही है। उसने लंदन में जाकर अंग्रेजी के नटबोल्ट ढीले कर दिए हैं। डिक्शनरी में घुस गई है। जहां तक इकोनामी की बात है सो अमेरिका जब नौकरियों के लिए भारत में कटोरा लिए घूम रहा है तो ब्रिटेन की क्या बिसात! मारकेट किस तरह की लीला करेगा? यह मारकेट के मालिकों को भी नहीं मालूम है। मारकेट से मीडिया नाभिनाल बद्ध है। वहां मंदी होती है तो इधर संकट बढ़ता है। बीबीसी को फंड इसी प्रक्रिया में मिलता है। फंड हर स्तर पर सिकुड़ रहे हैं। सबसे पहले हिंदी की इल्लत से पल्ला झाड़ा! नए जमाने में हिंदी जेब पर भारी पड़ गई है!
एक मानी में यह अच्छा ही है। हिंदी खैरात पर क्यों पले? उत्तर औपनिवेशिक काल में हिंदी अपने स्वत्व पर पले तो बेहतर। वह पल रही है। वह इस ग्लोबलाजेशन में हिंदी-उपभोक्ता बना रही है और मीडिया को बूम दे रही है। यह स्थिति जटिल है। हिंदी अगर अंग्रेजी की तरह उपभोक्ता की भाषा बन रही है तो एक भाषा की तरह अपने स्वत्व में लौट रही है। इसके आगे का गणित क्या बन रहा है? उसके बारे में सीमित जगह में यहां नहीं बताया जा सकता।