Tuesday, July 19, 2011
Monday, July 18, 2011
मर्डोक ने अखबारों में विज्ञापन देकर माफी मांगी
मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक ने अपनी कंपनी के फोन हैकिंग प्रकरण के लिए ब्रिटेन के कई बड़े अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन देकर माफी मांगी है। अखबारों में शीर्षक वी आर सॉरी के नाम से माफीनामा छपा है। इन अखबारों में द गार्जियन भी शामिल है जिसने सबसे पहले फोन हैकिंग का पर्दाफाश किया था। माफीनामे पर मर्डोक के हस्ताक्षर हैं। मर्डोक ने कहा है, जो गंभीर गलती हुई, उसके लिए हम माफी मांगते हैं। मुझे पता है कि केवल माफी मांग लेना पर्याप्त नहीं है। हमारा व्यवसाय इस विचार पर आधारित है कि स्वतंत्र और मुक्त प्रेस समाज में एक सकारात्मक शक्ति होनी चाहिए। ब्रिटेन के अलावा फोन हैकिंग विवाद के अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और चीन तक फैल जाने के बाद 80 वर्षीय मर्डोक का इससे निपटने का रवैया बदल गया है। इससे पहले मर्डोक की कंपनी के दो बड़े अधिकारी रेबेका बू्रक्स और लेस हिंटन शुक्रवार को इस मामले में इस्तीफा दे चुके हैं। ब्रूक्स लोगों के फोन हैक करके खुफिया खबरें बनाने वाले 168 साल पुराने साप्ताहिक अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्ड की संपादक थीं। मर्डोक ने इस अखबार को पिछले हफ्ते बंद कर दिया। जबकि लेस हिंटन मर्डोक के अन्य मीडिया ग्रुप डाउ जोंस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे। अखबार में छपे माफीनामे के अलावा मर्डोक ने लंदन में मिली डाउलर के परिवार वालों से भी माफी मांगी। मर्डोक ने इस परिवार से मिलने का अनुरोध तब किया जब उन्हें पता चला कि मिली डाउलर की हत्या से पहले उनका फोन न्यूज ऑफ द वर्ल्ड ने हैक किया था। परिवार के वकील ने कहा कि मर्डोक ने कई बार माफी मांगी और वह बार-बार अपने हाथों से अपने सिर को पकड़ अफसोस जाहिर कर रहे थे।
Saturday, July 16, 2011
मर्डोक के खिलाफ अमेरिका में भी जांच शुरू
वाशिंगटन, प्रेट्र : ब्रिटेन में मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक की मुश्किलें अभी कम भी नहीं हुई कि वह अमेरिका में भी घिर गए हैं। अमेरिका में रूपर्ट की कंपनी न्यूज कॉर्प पर 9/11 हमलों के पीडि़तों के फोन हैक करने के आरोप लगने के बाद उसे संघीय जांच एजेंसी एफबीआइ का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि ब्रिटेन में मर्डोक और उनका परिवार फोन हैकिंग प्रकरण के लिए माफी मांगने को तैयार हो गया है। वह इस सप्ताहांत ब्रिटेन में अपनी कंपनी के सभी अखबारों में माफीनामा प्रकाशित करेंगे। अपने देशवासियों के फोन हैक किए जाने से नाराज अमेरिकी सांसदों ने मामले की जांच एफबीआइ से कराने की मांग की है। इस संबंध में एफबीआइ के निदेशक रॉबर्ट मुलर के पास सांसदों का आग्रह आने के बाद उन्होंने जांच के आदेश दिए। उल्लेखनीय है कि एफबीआइ सांसदों द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों की प्रारंभिक जांच करके यह तय करती है कि मामले की पूर्ण जांच की जरूरत है या नहीं। इससे पहले ब्रिटेन में रूपर्ट की कंपनी न्यूज इंटरनेशनल पर वैज्ञानिकों, खूंखार अपराधियों और इराक युद्ध में मारे गए सैनिकों के परिजनों के फोन हैक करके सूचनाएं जुटाने के आरोप लगे थे। इन्हीं आरोपों के चलते मर्डोक को ब्रिटेन में अपना 168 साल पुराना साप्ताहिक अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्ड बंद करना पड़ा था। एक अन्य खबर के अनुसार रूपर्ट और उनके पुत्र जेम्स मर्डोक ब्रिटेन की संसद की मीडिया मामलों की समिति के समक्ष पेश होने को तैयार हो गए हैं। यह जानकारी कंपनी ने दी है। समिति दोनों से फोन हैकिंग मामले में अगले हफ्ते पूछताछ करेगी। मुख्य कार्यकारी अधिकारी रिबेका ने दिया इस्तीफा लंदन, प्रेट्र : फोन हैकिंग मामले में पडे़ भारी दबाव के चलते रूपर्ट मर्डोक की कंपनी न्यूज इंटरनेशनल की मुख्य कार्यकारी अधिकारी रिबेका ब्रूक्स ने इस्तीफा दे दिया है। मर्डोक ने भी उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। वह कंपनी के चार अखबारों द सन, द टाइम्स, द संडे टाइम्स और बंद हो चुके न्यूज ऑफ द वर्ल्ड का काम देख रही थीं। उनपर फोन हैकिंग को बढ़ावा देने का आरोप है। इस्तीफे में उन्होंने अपने किए पर पछतावा व्यक्त किया है। ब्रिटिश सांसदों ने उनके इस कदम का स्वागत करते हुए कहा है कि यह बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था।
Tuesday, July 12, 2011
रूपर्ट मर्डोक के बीस्काईबी के अधिग्रहण पर मंडराया खतरा
फोन टैपिंग प्रकरण के बाद मीडिया जगत के बादशाह रूपर्ट मर्डोक की सेटेलाइट ब्रॉडकास्टिंग कंपनी, ब्रिटिश स्काई ब्रॉडकास्टिंग (बीस्काईबी) को अधिग्रहित करने की कोशिशों पर पानी फिरता दिख रहा है। एक सप्ताह पहले तक ब्रिटिश राजनीति पर जबर्दस्त प्रभाव रखने वाले मर्डोक से सभी दलों ने दूरी बनानी शुरू कर दी है। सोमवार को सरकार और विपक्षी दलों के नेताओं ने इस सौदे को स्थगित या लंबे समय तक टालने का आह्वान किया। उप प्रधानमंत्री निक क्लेग ने सोमवार को न्यूज ऑफ द वर्ल्ड द्वारा फोन टैपिंग की सोमवार को फिर आलोचना की। उन्होंने कहा, मर्डोक लंदन में हैं। चीजों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। मैं उनसे सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि वह यह समझने की कोशिश करें कि लोग इसबारे में कैसा महसूस करते हैं। देश ने विभिन्न रहस्योद्घाटनों पर किस तरह घृणा के साथ प्रतिक्रिया की है। निक क्लेग की पार्टी लिबरल डेमोक्रेट्स मर्डोक के मीडिया साम्राज्य के प्रभाव और ताकत की लगातार आलोचना करती रही है। सेलिब्रिटी, खूंखार अपराधियों और इराक युद्ध में मारे गए सैनिकों के परिजनों के फोन हैक करके सूचनाएं जुटाने के गंभीर आरोप लगने के बाद न्यूज ऑफ वर्ल्ड अखबार के मालिक रूपर्ट मर्डोक ने इसे बंद करने का फैसला लिया। मर्डोक के सर्वाधिक बिकने वाला टैबलायड ने पिछले साल हुए चुनाव में लेबर पार्टी का समर्थन किया था। क्लेग ने मर्डोक से कहा, मर्यादित कार्य करिए और बीस्काईबी के सौदे के लिए पुनर्विचार करिए। शाही परिवार के सुरक्षा अधिकारियों ने रिश्वत लेकर फोन नंबर लीक किए न्यूज ऑफ द वर्ल्ड के पूर्व शाही मामलों के संपादक क्लाइव गुडमैन ने शाही परिवार के सुरक्षा अधिकारियों को रिश्वत देकर प्रिंस विलियम सहित शाही घराने के कई लोगों के नंबर एकत्रित किए थे। बीबीसी के बिजनेस मामलों के संपादक रॉबर्ट पेट्सन ने यह दावा किया है। रॉबर्ट के मुताबिक न्यूज ऑफ द वर्ल्ड के तत्कालीन संपादक एंडी कल्सन ने गुडमैन को ऐसा करने के लिए कहा था। शाही परिवार के फोन नंबरों वाली बुक को ग्रीन बुक कहा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार प्रयोग के बाद ग्रीन बुक को लॉक कर दिया जाता था। शाही के फोन नंबरों की हैकिंग का यह मामला 2005 में प्रकाश में आया था और 2007 में अदालत ने गुडमैन को जेल भेजा था।
Wednesday, June 29, 2011
अभिव्यक्ति की आजादी का सच
अंडरवर्ल्ड की दुनिया की गहरी समझ रखने वाले पत्रकार ज्योतिर्मय डे की निर्मम हत्या की घटना से पूरा देश स्तब्ध है। सिर्फ इसलिए नहीं कि एक खोजी पत्रकार की हत्या हो गई, बल्कि इसलिए भी कि हत्या एक ऐसे पत्रकार की हुई है, जिसके लिए अपने पेशे के मूल्य और समाज के प्रति जिम्मेदारी अपनी जान से भी बढ़कर थी। मीडिया जगत और अभिव्यक्ति की आजादी को जरूरी समझने वाले आम नागरिकों के लिए इससे भी ज्यादा सदमे वाली बात यह है कि देश की आजादी के छह दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद पत्रकारों की सुरक्षा के लिए हमारे पास कोई मजबूत कानून नहीं है। शर्मनाक यह है कि जब भी ऐसा कोई कानून बनने की बात आती है तो उसे किसी न किसी बहाने टाल दिया जाता है और टलवाने का प्रयास करने वालों में कुछ राजनेता भी शामिल होते हैं। अगर वे जाहिर तौर पर इसमें शामिल न हों तो भी इसमें कोई दो राय नहीं है कि ऐसा उनकी इच्छा के बगैर नहीं हो सकता। चाहे यह मदद सिर्फ उदासीनता के रूप में ही क्यों न हो। सोचा जाना जरूरी हो गया है कि वे कौन से सच हैं, जिनके उजागर होने से हमारे राजनेता इतने ज्यादा घबराए हुए हैं और जिनके कारण वे पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित होने नहीं देना चाहते। इस नृशंस हत्याकांड के सिलसिले में छोटा शकील गिरोह के तीन गुर्गे हिरासत में लिए जा चुके हैं। पूछताछ भी काफी कुछ हो चुकी है। कई तरह की बातें सामने आ चुकी हैं। इसी सिलसिले में एक पुलिस अधिकारी से भी पूछताछ हो चुकी है। हालांकि सामने आई किसी बात पर अभी न तो पुलिस यकीन कर पा रही है, न मीडियाकर्मी और न आमजन ही। जांच की दिशा भी सुनिश्चित नहीं हो सकी है। कभी इसके पीछे चंदन तस्करों का हाथ माना जा रहा है और कभी महाराष्ट्र के तेल माफियाओं का। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ये दोनों ही देश के बेहद खतरनाक गिरोहों में शामिल हैं। चंदन तस्करी के काले धंधे के तहत क्या-क्या हुआ है, यह किसी से छिपा नहीं है। तेल माफियाओं का बेहद वीभत्स कारनामा कुछ ही महीने पहले सामने आया था, जब एक अतिरिक्त जिलाधिकारी यशवंत सोनवाने को जलगांव में दिनदहाड़े जलाकर मार डाला गया था। तब महाराष्ट्र सरकार ने यह भरोसा दिलाया था कि वह तेल माफिया को जड़ से उखाड़ फेंकेगी, लेकिन अब? अगर इस पूरे प्रकरण पर नजर डालें तो पता यह चलता है कि नतीजा अंतत: शून्य ही रहा। आखिर क्यों? डे को तेल माफियाओं व उनके धंधे की गहरी जानकारी थी। इन पर वह कई महत्वपूर्ण खबरें लिख चुके थे। यह बात भी सामने आई है कि वह इधर चंदन तस्कर कासिम के बारे में कोई स्टोरी लिखना चाह रहे थे। दुबई में रह चुका कासिम छोटा शकील का व्यावसायिक साझेदार है। यह बात कासिम को पता चल गई थी। इसके बाद कासिम ने पहले उन्हें किसी मध्यस्थ के जरिये बड़ी रकम देने की पेशकश की और फुसलाना चाहा, लेकिन डे ने इससे इनकार कर दिया और नतीजा यह हुआ कि उन्हें जान से हाथ धोना पड़ा। माफियाओं और अराजक तत्वों की शर्तो को मानने और उनके फुसलाने में न आने वाले पत्रकारों का हमारे देश में क्या हश्र होता है, यह अलग से लिखने की जरूरत नहीं है। ऐसा कोई अकारण नहीं है कि पत्रकारों की सुरक्षा की निगरानी रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था की सूची में भारत को दागदार सातवीं जगह दी गई है। इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि इस मामले में पाकिस्तान की हालत भी हमसे बेहतर है। लोकतंत्र और लोकतंत्र के स्तंभों की सुरक्षा के प्रति हम कितने जिम्मेदार और जवाबदेह हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खुद महाराष्ट्र पुलिस अभी तक इस घटना की जांच के मामले में कुछ खास तरक्की कर नहीं पाई और राज्य सरकार सीबीआइ जांच की इजाजत भी नहीं दे रही है। इसके लिए पत्रकारों ने अनशन व प्रदर्शन किया और धरना भी दिया। मुख्यमंत्री ने उनकी बातें सुनीं भी, लेकिन मांगें नहीं मानी। न केवल मुंबई या महाराष्ट्र, पूरे देश का समूचा मीडिया जगत आज भी अपनी इस मांग पर अडिग है। आखिर क्या वजह है कि राज्य सरकार मामला सीबीआइ को सौंपने से इनकार कर रही है? अगर अब तक उसकी पुलिस कुछ पता नहीं लगा सकी तो आगे कुछ कर लेगी, ऐसी उम्मीद उसे किस तरह है? बाद में जब राज्य पुलिस पूरी तरह हाथ खड़े करने की मुद्रा में आएगी, तब तक कई और मामलों की तरह इसके सबूत भी अपराधियों द्वारा पूरी तरह मिटाए जा चुके होंगे। फिर इसे सीबीआइ या किसी को भी सौंपने से क्या फायदा होगा? ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार इन तथ्यों से अवगत नहीं है। सच तो यह है कि सरकार पत्रकारों और आम जनता से ज्यादा इन तथ्यों को जानती है। वह यह भी जानती है कि देश में पत्रकारों की सुरक्षा और इन पर होने वाले हमलों की जांच निष्पक्ष और तेज गति से कराया जाना सुनिश्चित करने के प्रावधान कितने जरूरी हैं। इसके बावजूद वह इस मसले पर कोई कदम आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं हो रही है। आखिर क्यों? मालूम हुआ है कि जब पत्रकारों के संरक्षण के लिए कानून पर चर्चा चल रही थी, उस वक्त एक वरिष्ठ राजनेता विरोध करने वालों में सबसे आगे और सर्वाधिक मुखर थे। इससे सिर्फ यही जाहिर नहीं होता है कि हमारे देश की सरकारें पत्रकारों की सुरक्षा के प्रति कितनी इच्छुक और गंभीर हैं, यह सवाल भी उठता है कि ऐसा क्यों है? यह सवाल व्यवस्था पर अकसर उठने वाले आम सवालों जैसा नहीं है। सच तो यह है कि यह स्थिति देश में पत्रकारों की ऐसी असुरक्षा के पीछे राजनेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल है। सरकार को यह देखना होगा कि वे कौन से कारण हैं, जिनके नाते दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाले भारत की हैसियत पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में पाकिस्तान से भी गई-गुजरी है। क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जानकारी के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी का यही हश्र होना चाहिए? अगर वास्तव में सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति कटिबद्ध है तो उसे तुरंत देश भर में पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कानून लाना चाहिए। साथ ही जे.डे हत्याकांड की जांच तो तुरंत सीबीआइ को सौंपे ही, उन लोगों की भूमिका को भी खंगाले जो पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानून लाए जाने का विरोध कर रहे हैं। पूरा मीडिया जगत और आम जनता यह चाहती है कि डे की हत्या के दोषियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाए और उन पर यथोचित कानूनी कार्रवाई हो। साथ ही यह भी देश में पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित कराई जाए। अगर कोई इसके लिए प्रभावी कानून लाए जाने का विरोध कर रहा है तो क्यों, यह जानने का हक न केवल मीडियाकर्मियों, बल्कि पूरे देश की आम जनता को भी है। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)
अखबारों की आजादी पर आघात
लेखक वेज बोर्ड की सिफारिशों को अव्यावहारिक और प्रेस की आर्थिक आजादी पर आघात मान रहे हैं…
देश की आजादी के लिए लोकमान्य तिलक और गांधीजी ने भी अखबार निकाला था। देश तो आजाद हो गया, लेकिन सत्ता तंत्र अखबारों की आजादी नहीं पचा पा रहा। आजादी में सक्रिय योगदान देने वाले अखबारों की आजादी सत्ता प्रतिष्ठान को सबसे ज्यादा डरा रही है। वेतन आयोग के जरिये अखबारों की गर्दन कसने की उसकी मंशा और कृत्य नए नहीं हैं। समाचार पत्र उद्योग के लिए एक के बाद एक वेज बोर्ड लाना और फिर जमीनी सच्चाई की अनदेखी कर उनकी मनमानी अनुशंसाएं स्वीकार करने के लिए दबाव बनाने का एकमात्र उद्देश्य प्रेस को सरकार पर निर्भर बनाए रखना ही जान पड़ता है, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है। प्रेस को नियंत्रित करने के लिए पत्रकारों का वेतनमान निर्धारित करने का जो अधिकार सरकार ने अपने हाथ में ले रखा है, अब वह उसका विनाशकारी इस्तेमाल करने के मूड में नजर आ रही है। लगता है कि सरकार ने अखबारों की आजादी के साथ-साथ उनके वजूद को ही नेस्तनाबूद करने की ठान ली है, अन्यथा मजीठिया वेज बोर्ड की 80 से 100 फीसदी तक वेतन वृद्धि की अव्यावहारिक सिफारिशों का कोई औचित्य समझ में नहीं आता। इन सिफारिशों के लागू होने का मतलब है कई छोटे क्षेत्रीय अखबारों में तालाबंदी। अन्य अखबारों के लिए भी इनका बोझ वहन कर पाना असंभव है। यह नहीं माना जा सकता कि बाजार का सीधा-सा अर्थशास्त्र सत्ता प्रतिष्ठान नहीं समझता। उसकी नीयत पत्रकारों या दूसरे प्रेस कर्मचारियों का भला करना तो नहीं हो सकती। निशाना तो समाचार पत्र उद्योग की आर्थिक आजादी और ताकत है। इस बेजा हस्तक्षेप का नुकसान उन कर्मचारियों को ही होगा, जिनकी सरकार खैरख्वाह बनने की कोशिश कर रही है। आखिर अखबार कैसे प्रकाशित हो पाएंगे, जब उनके कर्मचारियों के वेतन असंतुलित ढंग से आकाश छूने लगेंगे? सरकार उस रिपोर्ट को भी भुला रही है जो राष्ट्रीय श्रम आयोग के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री रवींद्र वर्मा ने 2002 में दी थी। इसमें किसी भी उद्योग में किसी भी प्रकार के वेतन आयोग की जरूरत नहीं मानी गई थी। देश में चीनी उद्योग को छोड़ दें तो किसी भी उद्योग में 1966 के बाद वेतन आयोग का गठन ही नहीं हुआ। इसके चलते कोई असंतोष नहीं दिखता तो इसकी सीधी वजह यह है कि हर जगह लोग अपने सेवायोजक से सीधा संबंध रखते हैं और हर जगह बाजार की जरूरतों के हिसाब से काम हो रहा है और बाजार ही वेतन तय करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। जब कहीं और वेज बोर्ड नहीं है तो फिर केवल अखबार में क्यों? क्या ऐसा नहीं लगता कि सरकार वेज बोर्ड के बहाने अखबारों पर परोक्ष नियंत्रण रखना चाहती है? इससे इंकार नहीं कि अखबार कर्मियों को बेहतर वेतन मिलना चाहिए, लेकिन आखिर किस कीमत पर? मीडिया अब कई रूपों में पांव पसार रहा है, लेकिन सरकार टीवी, इंटरनेट आधारित मीडिया समूहों के लिए वेजबोर्ड की बात नहीं करती। जब इनके लिए वेतन बोर्ड नहीं है तो फिर अकेले प्रिंट मीडिया पर मेहरबानी क्यों? जरा वेतन सिफारिशों पर गौर करें। इनके अनुसार कुछ बड़े अखबारों में काम करने वाले चपरासियों और ड्राइवरों का वेतन भी 45-50 हजार रुपये महीने तक हो सकता है। क्या सरकारी प्राइमरी स्कूलों के शिक्षकों को इतना वेतन मिलता है? क्या सिपाहियों, दरोगाओं और सीमा पर जान जोखिम में डालने वाले सैनिकों को भी सरकार इतना वेतन दे रही है? आखिर जब सरकार अपने इन कर्मचारियों को इतना वेतन नहीं दे रही तो फिर यह उम्मीद कैसे करती है कि अखबार अपने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को इतना वेतन दे सकते हैं? क्या इसे ही दोहरा मानदंड नहीं कहते? न्यायमूर्ति मजीठिया की रिपोर्ट में अखबारों के कर्मचारियों का वेतन 80 से सौ फीसदी तक करने की सिफारिश है। इसके साथ ही सरकार के निर्देश पर अखबारों को जनवरी 2008 से 30 प्रतिशत की अंतरिम राहत देनी पड़ी है। इससे समाचार पत्र उद्योग में हाहाकार मचा है और वह असामान्य वेतन सिफारिशों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर हुआ है। प्रेस को कथित चौथे स्तंभ का दर्जा देने वाले सत्ता तंत्र का यह प्रयास क्या लोकतंत्र को कमजोर करने वाला नहीं माना जाना चाहिए? सबसे विचित्र यह है कि जिस वेतन भुगतान का सरकार इतने जोरदार ढंग से निर्देश देती है, उसका एक भी पैसा उसे नहीं देना होता। यदि बढ़े खचरें की वजह से कोई अखबार घाटे में जाने लगे तो वह उसे बचाने भी नहीं आती। समाचार पत्र समूहों को अपने चंगुल में रखने की कोशिश के चलते सरकारों ने अपने विज्ञापनों का भी राजनीतिकरण कर दिया है। एक ओर मजीठिया वेज बोर्ड की अनाप-शनाप सिफारिशों के जरिये अखबारों की अर्थव्यवस्था पर चोट की जा रही है और दूसरी ओर डीएवीपी विज्ञापन की दरें इतनी कम रखी गई हैं कि अखबार आर्थिक रूप से कमजोर बने रहें। आखिर इन दरों को बाजार दर के बराबर क्यों नहीं किया जा रहा? यह भी किसी से छिपा नहीं कि सत्ता में बैठे लोग किस तरह पाठकों को नजर न आने वाले उन अखबारों को भी अपने यहां से विज्ञापन जारी कराते हैं, जिनकी प्रसार संख्या मात्र उनके कार्यालयों तक ही सीमित रहती है। ऐसे गुमनाम से अखबार निकालने वालों और उन्हें प्रश्रय देने वालों में सबसे आगे ये राजनीतिज्ञ हैं। इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सत्ता में बैठे लोग एक ओर प्रेस की आजादी का दम भरते हैं और दूसरी ओर पत्रकारों के जेबी संगठनों को बढ़ावा भी देते हैं। यही नहीं वे ऐसे संगठनों के पत्रकारों को तरह-तरह से उपकृत भी करते हैं ताकि उनके काले कारनामों पर पर्दा पड़ा रहे। अब तो सत्ता प्रतिष्ठान के स्वाथरें की पूर्ति में सहायक बनने वाले पत्रकारों को सरकारी स्तर पर भी उपकृत करने का सिलसिला चल निकला है। खतरनाक यह है कि इस सिलसिले को वैधानिकता भी प्रदान की जा रही है। इस सबको देखते हुए इस नतीजे पर पहुंचने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय रह ही नहीं जाता कि सरकार वेतन आयोग की मनमानी और अव्यावहारिक सिफारिशों के जरिये चौथे स्तंभ को कमजोर करने का प्रयास कर रही है? (लेखक दैनिक जागरण के कार्यकारी अध्यक्ष हैं)
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