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Tuesday, March 22, 2011

अगले पांच साल में ऊंची उड़ान भरेगा भारतीय मीडिया उद्योग


कंपनियों के विज्ञापन खर्च में हुआ 17 प्रतिशत का इजाफा
उद्योग की औसत वार्षिक वृद्धि 14 फीसद रहने के आसार
कुल कारोबार 28 अरब डालर तक पहुंचने की उम्मीद
मीडिया क्षेत्र में बढ़ते कारोबार और विज्ञापन खर्च में तेजी से आते सुधार के बाद भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग की औसत सालाना वृद्धि 14 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। फिक्की-केपीएमजी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 तक भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग 1,27,500 करोड़ रुपए (करीब 28 अरब डालर) का हो जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 में मीडिया और मनोरंजन उद्योग में 2009 के मुकाबले 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 65,200 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। इस साल इसमें 13 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। रिपोर्ट को औपचारिक तौर पर फिक्की फ्रेम्स 2011 में बुधवार को पेश किया जाएगा। फिक्की के महासचिव अमित मित्रा ने कहा 'मीडिया क्षेत्र में क्षेत्रीय बाजारों की बढ़ती संभावना, बढ़ती जागरुकता और जनजन तक बढ़ती पहुंच को देखते हुए क्षेत्र में वृद्धि की व्यापक संभावनाएं हैं।' उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया (ऑनलाइन) का महत्व भी तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2010 में विज्ञापन पर होने वाले खर्च में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 26,600 करोड़ रुपए हो गया जो कि उद्योग के कुल कारोबार का 41 प्रतिशत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि टीवी विज्ञापन और ग्राहकों से होने वाली आमदनी के वर्ष 2015 तक बढ़कर क्र मश: 21,400 करोड़ रुपए और 41,600 करोड़ रुपए हो जाने की उम्मीद है। केपीएमजी के मीडिया और मनोरंजन प्रमुख राजेश जैन ने कहा 'आने वाले समय में मीडिया कंपनियों को अपने कारोबार के मॉडल में सुधार करना जरूरी हो जाएगा। कंपनियों को मुनाफे के साथ साथ ग्राहकों की बदलती रूचि पर ध्यान देना होगा।'

Sunday, March 13, 2011

इस मर्ज की दवा क्या है


तीन दशक से ज्यादा हो गए हैं, मुझे अपने भारत महान के अखबारों में काम करते हुए, लेकिन अब भी समझ नहीं पाई हूं कि हम पत्रकार लोग क्यों उन चीजों पर ध्यान नहीं देते, जो सबसे महत्वपूर्ण हैं। क्यों भिनभिनाते हैं उन खबरों के आसपास, जो दो दिन में भुला दी जाती हैं? क्यों भागते-फिरते हैं नेताओं के पीछे उनके हर बयान को ऐतिहासिक मानकर? क्यों नहीं पूछते हैं उनसे ऐसे सवाल, जिनके आधार पर नई नीतियां बन सकती हैं, नई दिशाएं खुल सकती हैं? मिसाल के तौर पर, क्यों नहीं उनसे पूछते कि वे जो सुबह-शाम ‘आम आदमी’ के नाम की रट लगाते रहते हैं, उस आम आदमी के लिए हम बुनियादी सेवाएं क्यों नहीं उपलब्ध कर पाए हैं 63 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद भी?
अगर किसी दूसरे देश के बारे में विश्व बैंक के सर्वेक्षण बताते कि हर वर्ष वहां के 2.4 करोड़ आम नागरिक गरीबी रेखा के नीचे गिर जाते हैं स्वास्थ्य कारणों से, तो यह खबर सुर्खियों में होती। अपने देश में ऐसा हो रहा है, लेकिन ऐसी खबरें अखबार के किसी कोने में छाप दी जाती हैं। और भी आंकड़े आए हैं विश्व बैंक की तरफ से, जो सनसनीखेज हैं, दुखदायी हैं, लेकिन हम पत्रकार इनको अहमियत नहीं देते। सुनिए जरा।
भारत देश में 1,00,000 लोगों पर अस्पतालों में 90 पलंग हैं, अन्य देशों में कम से कम 270 पलंग होते हैं, इतनी आबादी के लिए। अपने देश में 1,00,000 लोगों की सेवा के लिए 60 डॉक्टर और 130 नर्सें हैं। अन्य देशों में इतने लोगों की सेवा में अकसर 140 डॉक्टर और 280 नर्सें होती हैं।
और सुनिए। भारत देश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं इतनी रद्दी, इतनी घटिया हैं कि 80 फीसदी भारतीय अपना इलाज किसी प्राइवेट अस्पताल या डॉक्टर से करवाने पर मजबूर हैं। क्यों न हो सेवाएं घटिया, जब बरसों से आम स्वास्थ्य सेवाओं पर हमारी सरकारें इतनी कंजूसी से खर्चती हैं पैसा कि देश के वार्षिक उत्पाद के कुल मूल्य (जीडीपी) में से केवल एक फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं पर निवेश करते आए हैं हम। आंकड़े शर्मनाक तो हैं ही, लेकिन यथार्थ और भी ज्यादा शर्मनाक है। मैं जब भी देश के देहातों में जाती हूं, मेरा पहला काम होता है गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का दौरा करना और लोगों से स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में पूछना। मैं ऐसा इसलिए करती हूं, क्योंकि मैं जानती हूं कि देहातों में ऋण का सबसे बड़ा कारण है परिवार के किसी सदस्य का इलाज। सरकारी अस्पतालों में भी इलाज करवाना हो, तो दवाइयों पर इतना खर्च होता है कि देश का आम आदमी इनको सहने के सपने भी नहीं देख सकता। कर्ज लेना पड़ता है किसी से, फिर कर्ज चुकाना बड़ता है सूद देकर। जो लोग मुश्किल से दो वक्त की रोटी खिला पाते हैं अपने परिवारों को, उनका हाल क्या होता है, आप किसी भी गांव में जाकर किसी से पूछ कर देख सकते हैं। फिर दौरा कीजिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का, जहां यकीन के साथ मैं कह सकती हूं कि न आपको डॉक्टर मिलेंगे, न दवाइयां। उत्तर प्रदेश के अस्पतालों का मैंने कुछ वर्ष पहले दौरा किया था एक टीवी प्रोग्राम के लिए और मैंने जो चीजें देखीं, उनके बारे में बता नहीं सकती। देहातों में अस्पताल के नाम पर ऐसी इमारतें थी, जिनके कमरों में पेड़ उग रहे थे, जिनकी छतें कब की गिर चुकी थीं और जहां मरीजों का नाम-ओ-निशान न था। थोड़ी तहकीकात के बाद मालूम पड़ा कि इमारतों के निर्माण में ही पैसा बनाते हैं हमारे देश के विधायक। स्वास्थ्य सेवाओं में उनकी रुचि बस यहीं तक रहती है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर जगह-जगह दिखती हैं खंडहर हो चुकी इमारतें।
बेचारा आम आदमी इलाज कराने के लिए किसी प्राइवेट अस्पताल या प्राइवेट डॉक्टर के पास नहीं जाए, तो कहां जाए? मगर वहां भी इलाज के नाम पर धोखा होता है। गरीबों की सेवा में अकसर नीम हकीम होते हैं या फिर वे छू-मंतर वाले, जो देहातों की जहालत का फायदा उठाकर अपना कारोबार चलाते हैं। ये सारी बातें जानते हैं हमारे राजनेता। दशकों से जानते हैं, लेकिन करते कुछ नहीं। हम पत्रकारों का दोष भी कम नहीं। हम अगर रोज नहीं, तो हफ्ते में एक बार ही सही, स्वास्थ्य-शिक्षा सेवाओं को सुर्खियों में लाने का प्रयास करें, तो शायद हमारे राजनेताओं को शर्म महसूस हो। लेकिन हम हैं कि दौड़े-दौड़े फिरते हैं हर नई सनसनीखेज खबरों के पीछे। हमसे भी गए गुजरे हैं टीवी वाले, जिनकी नकल आजकल हम भी कर रहे हैं, क्योंकि हमको लगता है कि खबरें अगर मजेदार, चटपटी, गरमागरम न हुई, तो बात नहीं बनती। समस्या यह है कि जब तक हम पत्रकार अपना रवैया नहीं बदलेंगे, राजनीतिज्ञों को बदलने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी और जब तक वे नहीं बदलेंगे, देश की स्वास्थ्य सेवाएं बीमार ही रहेंगी। यही हाल रहा, तो भारत का विकसित देश बनने का सपना अधूरा ही रहेगा|

Monday, February 21, 2011

तलवार की धार पर मीडिया


यदि उत्तर भारत के किसी राज्य में पांच दिनों के लिए अखबार बंद होने का ऐलान किया जाता, तो शायद यह एक बड़ी खबर बनती। पर मणिपुर में इस तरह की हलचल हमारे समाज का अहम हिस्सा नहीं बन पाती। वहां की तकलीफें हमारे लिए बेमानी हैं। अलगाव की मांग कर रहे इस राज्य के प्रति हमारे जनमानस में एक विलगाव पहले से ही मौजूद है, जिसे वहां की संस्कृति, भाषा और स्वरूप ने मजबूत आधार प्रदान किया है। मुख्यमंत्री के आश्वासन के बाद बेशक वहां के पत्रकारों ने सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार खत्म कर दिया है, लेकिन इससे उनके आक्रोश को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
दरअसल मणिपुर के एक प्रतिष्ठित दैनिक सनलाइबाक के संपादक बाम मोबी को पिछले दिनों पुलिस ने एक प्रतिबंधित संगठन से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया, लेकिन पत्रकारों की मांग है कि उन पर लगाए गए सभी आरोप सरकार वापस ले ले। मणिपुर के लोग पिछले कई वर्षों से दमन के खिलाफ गांधीवादी तरीका अपनाते हुए विफल रहे हैं। ऐसे में प्रतिरोध के स्वर और भी मुखर हुए हैं। प्रतिरोध करने वाले संगठनों की संख्या 30 से ऊपर पहुंच गई है। जन समर्थन हासिल कर चुके प्रतिबंधित संगठनों की बात सामने लाने के लिए उनसे संबंध रखना पत्रकारों के लिए जरूरी है। लेकिन उनसे संबंध रखने पर सरकार की नजर टेढ़ी हो रही है। यह पूर्वोत्तर के मीडिया के लिए वाकई संकट का समय है। मणिपुर जैसे राज्यों में वास्तविक स्थितियां लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत जा रही हैं। ऐसे में, लोकतंत्र की रक्षा के लिए स्वयंनिर्मित संस्थान राजसत्ता के लिए खतरा बन गए हैं। इन पर दबाव होता है कि ये सरकार समर्थक हो जाएं और सरकारी कामों को जायज ठहराएं अन्यथा सत्ता की दमनकारी अभियानों में दबा दिए जाएंगे। लिहाजा जमीनी स्तर के किसी भी कार्यकर्ता के राजद्रोही होने की पूरी आशंका है।
सरकारी संस्थानों में कार्यरत बुद्धिजीवी जब न्यायपालिका के किसी फैसले का विरोध करते हैं, तो तथ्यात्मक आधार पर वह भी एक तरह का राजद्रोह ही होता है। लेकिन पूरा मसला इस बात पर निर्भर करता है कि संरचनात्मक आधार पर राज्य के लिए खतरा कौन और कैसे बन रहा है। यह कल्याणकारी राज्य में बढ़ते वर्गीय विभाजन का एक कटु स्वरूप है, जो इन दोनों के अंतर्विरोध से निकलकर आ रहा है। ऐसे में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों आदि के लिए निष्पक्ष भूमिका निभाना मुश्किल होता जा रहा है। यह स्थिति बिनायक सेन, उड़ीसा के पत्रकार लक्ष्मण चौधरी से लेकर कश्मीर और मणिपुर के पत्रकारों-कार्यकर्ताओं तक पर लागू हो रही है। भले ही उनकी गिरफ्तारी के कारण स्थानीय आधार पर भिन्न हों, पर क्रियात्मक रूप से वे सभी एक ही धरातल पर खड़े हैं।
ऐसे में मीडियाकर्मियों को दो तरह के द्वंद्व में काम करना पड़ता है-एक तरफ अलग-अलग कारणों से चल रहे विभिन्न आंदोलनों की वास्तविक स्थितियों से लोगों को वाकिफ कराना, तो दूसरी तरफ सरकार की दमनकारी नीतियों से बचना। जबकि सरकार लगातार प्रतिबंधित संगठनों से संबंध रखने के आरोप में उन्हें प्रताड़ित करती है। उन संगठनों से संबंध रखे बगैर वास्तविकता सामने नहीं लाई जा सकती। पर सरकार उन्हें एकपक्षीय और अपनी निगरानी में ही काम करने के लिए बाध्य कर रही है। ऐसे में दायित्व और सुरक्षा बोध, दोनों दांव पर लगे हुए हैं।
जब भी कोई बड़ा आंदोलन स्वरूप लेता है, तो एक बड़ी जन भागीदारी उसमें उभरती है, जिससे मुकरना जनविरोधी कदम ही होगा। खास तौर से उन संस्थानों के लिए, जो जनमत की बहुलता को लोकतंत्र के रूप में देखते हैं। ऐसे में मानवाधिकार, नागरिक अधिकार, संप्रेषण की आजादी के लिए उठने वाली आवाजों की भूमिका क्या होगी? शायद सरकारी प्रतिबंधों को तोड़ते और दमनकारी रवैये से लड़ते हुए ही किसी ध्रुवीकरण की शुरुआत होगी, जहां जन आकांक्षाओं को तरजीह मिलेगी। राज्य के कल्याणकारी स्वरूप को प्रदर्शित करने वाली संस्थाओं के प्रति मोहभंग की शुरुआत यहीं से होगी। हो सकता है कि कॉरपोरेट मीडिया संस्थानों में काम करने वाले किन्हीं दबावों के चलते वर्तमान नीतियों का समर्थन करें, पर प्रतिबद्धताओं के टकराव यहां भी पनपेंगे और पनप रहे हैं।